Thursday, February 27, 2025

CHULUU BHAR PAANI

                                                 चुलू भर पानी 

हमारे पास नहीं है चुलू भर भी पानी 

आज ही नहीं सदियों से 

हम सिर्फ कोक,पेप्सी, बीयर,बोतल पीते  हैं ,

मैक्डोनाल्ड,बर्गर,पिज़ा,चॉकलेट से ही जीते हैं। 

इसीलिए हमारी चमड़ी सफ़ेद ,दिल काले, और खून ठंढे हो गए हैं 

हम में नहीं बची  ,शर्म,हया,लाज,सम्मान( एक भी मानवीय गुण )

नहीं तो मर  नहीं जाते चुलू भर पानी में 

मासूम बच्चों पर बम गिराने के पहले ,

गर्भवती माँओं पर मशीन गन चलाने के पहले 

लाश पर महाशक्ति ,विश्वविजेता के बूट बढ़ाने के पहले 

लेकिन मरे कहाँ ?

पानी चुलू भर भी नहीं 

सिर्फ कोक,पेप्सी ,बियर तंत्र ,

वह भी बोतल बंद 

लेकिन शेष दुनिया वालों !

तुम्हारी त्वचा तो काले,पीले, भूरे,श्याम,हृदय लाल और खून गर्म थे 

तुम तो करुणा, अहिंसा ,सत्य,समता, शान्ति के पुजारी 

मेसोपोटामिया ,बेबीलोन,हड़प्पा ,मोहनजोदड़ो ,

आर्य,बौद्ध,तिब्बती,पूर्वी सभ्यता के स्वाभिमानी 

अहिंसा ,करुणा,सत्य ही तुम्हारे धर्म थे 

तुम्हारे यहाँ तो पानी के जलाशय ही जलाशय हैं 

गंगा , कावेरी, सिंधु,दज़ला,फरात,ह्वांगहो,नील ,

असंख्य नदियाँ,तालाब,पोखर,झरने और झील। 

तुम सब ये देखने के पहले क्यों नहीं मर गये  

ये भी दिन देखने के लिए क्यों रह गए 

या देखने के बाद अब भी आघात या डर से 

अब क्यों नहीं मर जाते ?

नहीं, नहीं, तुम नहीं मर सकते ,

क्योंकि तुम्हे भी लग गयी है लत ,

और शुरू कर दिया है अर्सो से पीना 

पेप्सी,कोक,बीयर ,

तभी तो रहे मेरे साथ रत 

उसे नंगा,निहत्था करने कराने में माय डियर !

और जब वह निहत्था ही नहीं कंगाल हो गया

कुछ भी नहीं बचा नर कंकाल हो गया 

चुलू भर पानी को तरसने लगा 

तो हमने दिखा दी अपनी बहादुरी,

और कर दिया उसे धराशायी। 

हमें तुम बर्बर, आततायी,जानवर,गुंडा, शैतान, कुछ भी कह लो ,

अब इन्हे ही शर्म आएगी, और ये संग्यायें  ही लजाएंगीं   

चुनौती है विश्व के सभी साहित्यकारों,इतिहासकारों 

कवियों, लेखकों,समाज एवं मनोवैज्ञानिकों को 

खोजें,नोबेल पाएं और करें  मेरा नया नामकरण 

तबतक लिपटे रहने दो मेरे ऊपर 

प्रजातंत्र,मानवता का आवरण 

 ,अगर खुरचोगे तो मानवता, प्रजातंत्र के हत्यारों 

फिर दूसरी गलती के अपराध में 

तुम्हारा भी वही हश्र होगा ,

अब तो नंगे ,निहत्थे करने के पहले ही पातालशायी कर दिए जाओगे 

क्योंकि पहली गलती तुमने पहले कर दिया ,

मेरे दुश्मन बन गए जो खुल के मेरा साथ नहीं दिया 

इसलिए दुनियावालों !सावधान !

अभी भी बहुत पानी है ,चुलू भर पानी न मांगना पड़े 

उधार या कर्ज मरने के लिए ,

अतः खुद ही मर जाओ 

या कोक,पेप्सी,बीयर ही पिएंगे का नारा लगाओ 

अब आया तुम्हारी समझ में दुनिया के नेताओं,रहनुमाओं !

क्यों नहीं है हमारे पास यह मुहावरा 

कि चुलू भर पानी में मर जाओ। 


१२ अप्रैल २००३ ,वसुंधरा,गाज़ियाबाद  और धनबाद। बिहार  धनबाद,,ईराक़ युद्ध शुरू होने के बाद 

प्रकाशित,मई ,2003 ,सामयिक वार्ता,नई दिल्ली 










*KO-HONG,SO-HONG

                                को अहं - सो अहं 

धन हार गया

 तन डार गया

मन मार गया , जब देखा तुझको। 

                         ढूंढा तुमको कण कण में 

                         पाया तुमको निज दर्पण में 

                         भाया तुमको  मैं अर्पण में 

दिल का शूल गया 

सबकुछ भूल गया 

रस बन घूल गया ,जब देखा तुझको। 

                           सोने पर तुम आँखों में 

                         जगने पर तुम काँखो में 

                          सपने में तुम  पाँखों में 

मन महक गया 

तन चहक गया 

दिल बहक गया , जब देखा तुझको।

                    *'मरलायन' में तुम मिलती हो 

                       फूलों सी नित खिलती हो 

                      *'रोज़ाना' तुम मिलती हो  

तन सिमट गया 

मन लिपट गया 

अंग चिपट गया ,जब देखा  तुझको।  

                    ढूंढा तुमको ,पाया निजको 

                     ढूंढा निज को पाया तुमको 

                    मैं गाँऊ, तुम ठुमको, ठुमको

सब हूब गया 

मन ऊब गया 

तुझमे ही डूब गया , जब देखा तुझको। 

                        सत्य तुम्ही, सुन्दर तुम हो ,

                        शिव तुम्ही, अक्छुण तुम हो 

                       तुम ही,तुम ही, तुम ही,तुम हो 

सब वही रहा 

रस खूब बहा 

बस मैं नहीं रहा , जब देखा तुझको। 

                     अधरों पर मुस्कान भरी हो 

                     आँखों में अरमान भरी हो 

                       रसना में रसपान भरी हो 

तुमने पूछा -कोअहं ?कोअहं ?

झट बोल उठा-सोअहं ,सोअहं ,जब देखा तुझको। 


*मरलायन--मरलायन पार्क -सिंगापुर का प्रतिष्ठित पार्क

*रोज़ाना -रोज़ाना हेपवर्थ -सिंगापूर होटल की सेल्स मैनेजर 

*pohong --चिनी मूल की ,सिंगापुर प्रोडक्टिविटी बोर्ड की मैनेजर एंड प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर 


२५अप्रिल 1999 - एस्पलेनैड पार्क ,मरलायन पार्क के पास ,सिंगापुर 

   



 

  











   


PAHLE AUR AAJ

                              पहले और आज  

         कोई कीमत नहीं ,

पहले था हमारा घर सड़क से दूर 

शांत,शुद्ध ख़ुशीहाली से भरपूर।  

आज मेरे मकान का लौह- दरवाजा 

सीधे आम सड़क पर शोरगुल के बीच खुलता है 

हरकोई आनेवाला कुत्ते और चौकीदार से जूझता है। 

कीमत आसमान छू रहा ,मुहमाँगा  दाम मिल रहा। 

            कोई दिक्कत नहीं 

पहले हम घर से निकल बाहर बाज़ार जाते थे 

दो पैसे में दादी का चिमटा और गुर की मिठाई लाते थे 

आज पहुंच गया है बाजार हमारे घर में 

छाती पर चढ़ छीन रहा जो भी हमारे कर में 

बाजार में घर ,घर में बाजार 

बिन 'घर जारे आपना 'स्वर्ग मिले 

कबीरा भया लाचार। 

           किसी की हिम्मत नहीं 

जो पहले बाजार के समय और जगह को बदल सकता था 

पहले बाजार रामघाट पर हप्ते में सिर्फ एक बार लगता था 

आज घर में ही चौबीसो घंटे बाजार लगता है 

जहाँ प्लास्टिकी सदाबहार  फूल खूब फबता है 

बाजार की बाज़ीगरी -

बरसात में बसंत और ग्रीष्म में हेमंत ,

कोयल की टीबियाई कूक ,पसीने का अंत। 

                कोई ईज्जत नही  

पहले पानी, हवा, अतिथि को  भोजन नहीं थे बिकाऊ 

अब सम्प्पति ,शरीर क्या,आज आत्मा आस्था .

चरित्र  धर्म,ईश्वर ,रिश्ते-नाते. कुछ भी नहीं टिकाऊ। 

सब बाज़ार  में कार की मॉडल और फैशन की तरह बदल रहे 

फिर भी लैला-मजनू ,रोमियो -जूलियट ,सावित्री -सत्यवान की सीरियल में मगन रहे 

जीवन सत्य  से जो जितना दूर ,उतना ही लगता परिपूर्ण 

ऐसा पहले कभी नहीं 

क्यों सिर्फ आज ही ?


जून 2005  वसुंधरा ,






GARDAN AAPKA

                                                       गर्दन आपका

कलम भी उनका , दिमाग भी उनका 

नक्से बनाने का अधिकार भी उनका 

नक्से पर रेखा, बिंदु, लाल दाग भी  उनका 

किसे, कब, कहाँ, कैसे पहुँचना 

दौड़ना,चलना, रेंगना,या घुटने टेकना 

हर मोड़ पर हिदायत और आदेश भी उनका। 

जल,जंगल,जमीन ,जोरू ही नहीं 

जीवन,जिस्म,जज्बात और जबान भी उनका 

सबकुछ उनका,सबकुछ उनका 

सिर्फ गर्दन आपका। 


5 जुलाई 2014 ,नोएडा -कार्यालय 

Wednesday, January 22, 2025

MAANAVATAA DASAA[ UGUMA SATAK]

 मानवता दशा 

उत्पादकता बढ़ती जोर शोर से फिर भी गरीब लाचार 

सेवा के नाम पर होती जग में दीन हीन पर अत्याचार। 

गुणवत्ता का शोर मचा है,सारे जग में भाई

पर देखो शान्ति जग में कहीं नही है छाई। 1 

              उत्पादकता का लाभ गटकते ऊँचे थोड़े लोग 

             मानवता के नाम पे करते जग का असीम भोग।

             गरीब जनता,मज़दूर,किसान मुंह बाए ऊपर ही देखे

            शायद थोड़ा लाभ हमें भी मिले तो हम भूखे भी  चखें।  2  

पैर के नीचे की धरती ,जल, जंगल,जोरू सब छीन लिया 

हथियार,नशा व सौंदर्य प्रसाधन पूरी मानवता को लील लिया। 

विकाश की क्रूरतम दशा और दिशा है उलटी भाई 

नित मानवता को रौंदते ,कुचलते जग के रहनुमाई। 3 

            भूख,रोग,कुपोषण,शोषण,हिंसा से बिलबिलाते  आए  

            संवेदनहीन,भ्रष्ट,प्रतिद्वंदी दुनिया यह किससे कहा जाए  

             खेल-तमाशे,नाच-गान भूखे पेट कभी नहीं सुहाते 

            नस्ल,रंग,धर्म,जाति  के भेद उसे कभी नहीं लुभाते। 4 

मानवता के नाशक ये सब छीनते जनता के चैन अमन 

तितली, पक्षी,पशु, पादप, पुष्प-पत्तियां नही बचे चमन 

देखें, कैसे उत्पादकता ताला  मानवता पर हो गयी है हावी 

नदियां सुखीं ,पर्वत पिघलें , गुणवत्ता की खो गयी चावी। 5 

               उत्पादकता रोज बढ़े ,बढ़ती भूखे-नंगो, कंगालों  की आबादी 

               नित नव दवा तकनीक विकसे , कुछ चाँद पर काटे चांदी 

                मान ले अगर पूरे आर्थिक जग को एक कटोरा 

                बिन पेंदे का लोटा ,भ्रष्ट उच्च वर्ग ने सब बटोरा। 6 

मज़दूर, किसान तन-मन से डाले उसमे उत्पादकता पानी 

तरसे एक बून्द को प्यासे, पर कभी  न करता कोई नादानी

रोज नयी तकनीक वादा करती कल करेगी सबकी इच्छा पूरी 

हबस करती दूनी ,रोग चौगुनी ,आवश्यकता रहती अधूरी। 7 

               सम्बन्ध सब छलनी हो गए ,हृदय हो  गए तार- तार  

                बेटा प्रवास  में जी तोड़ कमाए ,माँ घर में रोये जार -जार 

                लक्ष्य एक है -अंदर खाली, बाहर दूसरे को झूठ समझाते 

                 संतोष परम निकृष्ट धर्म है ,बढ़ाओ हबस यही सिखाते। 8 

मानव की हालत देखो ,अंदर खाली बाहर भरा पड़ा है 

बिना नीव के सतह पर जैसे ऊंचा महल खड़ा है 

हवा की हल्की झोंको से वह हीलने ,गीरने लगता है 

इसीलिए आज मानव हरदम  सुरक्षा खोज में रहता  है। 9 

               बाहर बोझ से दबा है मानव ,अंदर खाली खाली है 

               माथे पर विज्ञापन चमके ,अधर पर कृत्रिम लाली है.

               मानवता  की सुधारें दशा ,उगमा बिन नहीं कोई चारा 

               गुणवत्ता जन जन  में हो बदलें उत्पादकता की धारा। 

मानवता है  अनन्त प्रेम रस ,बिन अगाध आत्मियता सम्बन्ध न कोई 

केयरिंग व् शेयरिंग से ओत - प्रोत हों  सब ,अखण्ड जीवन रस सोई। 


जून 2010,  गाँधी दर्शन गेस्ट हाउस ,हैदराबाद  


  

   








 

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HAM NAHI JAANATE- 2

 हम नहीं जानते 

क्या होती है

 सत्य की आशा ?,ज्ञान की पिपासा ?धर्म की जिज्ञाशा ?

ईश्वर की परिभाषा ? प्रेम की अभिलाषा ?

हम नहीं जानते और जानना भी नही चाहते ,

सिर्फ इतना मानते है कि हमारा जीवन 

सत्य,ज्ञान ,धर्म,ईश्वर,प्रेम से ओत -प्रोत है। 

और ये सभी चैतन्य के शास्वत जोत हैं 

इनके बिना हमारा जीवन ही आभाव  है 

जैसे पानी बिन मीन का स्वाभाव है। 

वाद-विवाद ,तर्क-वितर्क में पड़े वो 

जो कही और अटके और उलझे हैं  

हम तो एक हो आनंद रास चूस रहे 

प्रति क्षण हम टटके एवं सुलझे हैं ,

जो है शाश्वत,असीम,नित्य-नवीन 

उसे ढालते, मन के सांचे में 

करते छोटा,छुद्र बन जाते प्रवीण

फिर अपने मन की बात कहते,थोपते 

और करते विविध रूप में बखान 

ऐसे बनते मसीहा और महान। 

परन्तु हम एक छोटा सा अदना आदमी 

उसी को पहनते,ओढ़ते ,खाते,पीते,जीते  

बिना उसे जाने साथ नित्य रहते 

जो हो परे उसे ही जाना जा सकता है 

स्वयं को कैसे पहचाना जा सकता है ?

हम नित्य नवीन हो उनके संग बहते हैं 

सत्य,ज्ञान,धर्म,ईश्वर,प्रेम के संग रहते हैं 

कोई पूछता है ,आप इन्हे मानते, पहचानते ?

नहीं ,हम इन्हे जीते हैं ,हम कुछ नहीं जानते।

28 जून 1995 ,त्रिवेणी इंजीनियरिंग,खतौली ,मुज़्ज़फरनगर  

 




HAM NAHI JANATE-1

 हम नही जानते

किस  देश मे रहते हैं? 

किस वेश में रहते हैं ?

किस परिवेश में रहते हैं ?

हम नहीं जानते हैं 

न किसी वेष को मानते हैं 

न किसी बोली को पहचानते हैं 

तो कैसे पूछे कुशल क्षेम 

विना  बोध  के कहा होता है प्रेम। 

प्रेम भी नहीं ,ज्ञान भी नही 

मनुज होने का स्वाभिमान भी नही 

तो क्यों हम पेड़ या सब्जी की तरह ज़िंदा हैं 

लोमड़ी और खरगोश की तरह भयभीत और  शर्मिंदा  हैं। 

धरती के पानी को सोखते 

सूरज के अंशु को ओढ़ते 

सिर्फ आंधी के प्रबल प्रवेग  में ही 

हमारी पत्तियां पड़ोसी के पत्तों को छू पाती 

या सिर्फ भयंकर बाढ़ या तूफ़ान में ही हम टूटते 

एक दूसरे पर गिरते, पड़ते 

प्रकृति का यह कैसा खेल 

सिर्फ प्रलय में ही होता मेल। 

15 अप्रैल 1995 , होटल कनिष्क, दिल्ली