हमारे पास नहीं है ,चुल्लू भर भी पानी
आज ही नहीं सदियों से
हम सिर्फ कोक, पेप्सी, बियर, बोतल पीते हैं
मैकडॉनल्ड, बर्गर,पिज़्ज़ा,चॉकलेटसे ही जीते हैं
इसीलिए हमारी चमड़ी सफेद, दिल काले और खून ठंडे हो गए हैं
हम में नहीं बची करुणा, शर्म, हया, लाज ,सम्मान (एक भी मानवीय गुण)
नहीं तो मर नहीं जाते चुल्लू भर पानी में!
मासूम बच्चों पर बम गिराने से पहले
गर्भवती माओ पर मशीन गन चलाने के पहले
निहथ्था कर फिर मिसाइल चलाने से पहले
लाश पर महाशक्ति विश्व विजेता के बूट बढ़ाने से पहले
लेकिन मरे कहां ?पानी चुल्लू भर भी नहीं
सिर्फ कोक,पेप्सी,बियर- तंत्र
वह भी बोतल बंद
लेकिन शेष दुनिया वालों
तुम्हारे त्वचा तो काले, पीले, श्याम, हृदय लाल एवं खून गर्म थे
तुम तो करुणा, सत्य, समता, शांति के पुजारी
मेसोपोटामिया,बेबीलोन, हड़प्पा,मोहनजोदड़ो,
बौद्ध, तिब्बती,पूर्वी सभ्यता के स्वाभिमानी
अहिंसा, सत्य ही तुम्हारे धर्म थे
तुम्हारे यहाँ तो पानी के जलाशय ही जलाशय हैं
गंगा, कावेरी,नर्मदा ,सिंधु, दजला, फरात, ह्वांग हो नील
नदियां, तालाब, पोखर, झरने और झील
तुम सब ये देखने से पहले क्यों नहीं मर गए
ये दिन भी देखने के लिए क्यों रह गए
या देखने के बादआघात से या डर सेअब क्यों नहीं मर जाते
नहीं, नहीं मर सकते
क्योंकि तुम्हें भी लग गई है लत
और शुरू कर दिया है अरसों से पीना,पेप्सी कोक और बियर
तभी तो मेरे साथ रहे रत
उसे नंगा, निहत्था करने कराने में माय डियर
और जब वह निहत्था ही नहीं कंगाल हो गया
कुछ भी न बचा नर कंकाल हो गया
चुल्लू भर पानी को तरसने लगा तो हमने भी दिखा दी अपनी बहादुरी
और उसे कर दिया धराशाई
अब हमें तुम बर्बर,आतताई , गुंडा या शैतान कुछ भी कह लो
अब इन्हें ही शर्म आएंगी
यह संज्ञाएँ ही लजायेंगी
चुनौती है विश्व के सभी साहित्यकारों, कवियों, लेखको ,समाज एवं मनोवैज्ञानिकों को
खोजें, नोबेल पाएंऔर करें मेरा नया नामकरण
तब तक लिपटे रहने दो मेरे ऊपर प्रजातंत्र मानवता का आवरण
अगर खुरचोगे तो मानवता ,प्रजातंत्र के हत्यारों
फिर दूसरी गलती के अपराध में तुम्हारा भी वही हश्र होगा
निहत्थे नंगे करने के पहले हीअब तो पतलशायी कर दिए जाओगे
क्योंकि पहली गलती तुमने पहले ही कर दिया
मेरे दुश्मन बन गए जो खुल के मेरा साथ नहीं दिया
इसलिए दुनिया वालों सावधान,अभी भी बहुत पानी है
चुल्लू भर पानी न मांगना पड़े उधार या कर्ज
मरने के लिए
अतः खुद मर जाओ
या कोक, पेप्सी ,बियर ही पीयेंगे का नारा लगाओ
आया तुम्हारी समझ में नेताओं, दुनिया के रहनुमाओं
क्यों नहीं है हमारे पास यह मुहावरा कि
चुल्लू भर पानी में मर जाओ
20 अप्रैल 2003,लोधी गार्डन ,नयी दिल्ली
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