प्रेम गीत
जब से आपका नेह मिला ,मौसम भी अमृत बरसाने लगा है
उपाधि की आश गयी क्या ? और भी आनंद आने लगा है
चमन को कैसे बचाएं उल्लुओं ,गिद्धों के राज में
यही एक चिंता तोता,मैना,कोयलों ,भौंरो को सताने लगा है।
डाल, पत्ती की बात क्या , आकाश में भी है इनकी पहुँच
हर परिंदा डर-डर कर अपना पंख फड़फड़ाने लगा है।
जबसे आपके दर्शन हुए दुर्लभ ,ह्रदय और भी प्रेमगीत गाने लगा है।
सब जगह बस आप ही आप,अब तो पतझड़ में भी बसंत आने लगा है।
जब से नियति के नियम होने लगे भंग ,सेर को गीदड़ भी डराने लगा है।
शहर में सहर होती ही कब ,जबसे बिजली जगमगाने लगा है ?
जब से आपके नयन के नीर ने छुए हमारे बदन ,
चाँद का ठंढापन भी हमारे हृदय को गरमाने लगा है। ,
पांव भी थिरकने को बेताब ,जब से आपका गांव करीब नजर आने लगा है।
मार्च 2006
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