पहले और आज
कोई कीमत नहीं ,
पहले था हमारा घर सड़क से दूर
शांत,शुद्ध ख़ुशीहाली से भरपूर।
आज मेरे मकान का लौह- दरवाजा
सीधे आम सड़क पर शोरगुल के बीच खुलता है
हरकोई आनेवाला कुत्ते और चौकीदार से जूझता है।
कीमत आसमान छू रहा ,मुहमाँगा दाम मिल रहा।
कोई दिक्कत नहीं
पहले हम घर से निकल बाहर बाज़ार जाते थे
दो पैसे में दादी का चिमटा और गुर की मिठाई लाते थे
आज पहुंच गया है बाजार हमारे घर में
छाती पर चढ़ छीन रहा जो भी हमारे कर में
बाजार में घर ,घर में बाजार
बिन 'घर जारे आपना 'स्वर्ग मिले
कबीरा भया लाचार।
किसी की हिम्मत नहीं
जो पहले बाजार के समय और जगह को बदल सकता था
पहले बाजार रामघाट पर हप्ते में सिर्फ एक बार लगता था
आज घर में ही चौबीसो घंटे बाजार लगता है
जहाँ प्लास्टिकी सदाबहार फूल खूब फबता है
बाजार की बाज़ीगरी -
बरसात में बसंत और ग्रीष्म में हेमंत ,
कोयल की टीबियाई कूक ,पसीने का अंत।
कोई ईज्जत नही
पहले पानी, हवा, अतिथि को भोजन नहीं थे बिकाऊ
अब सम्प्पति ,शरीर क्या,आज आत्मा आस्था .
चरित्र धर्म,ईश्वर ,रिश्ते-नाते. कुछ भी नहीं टिकाऊ।
सब बाज़ार में कार की मॉडल और फैशन की तरह बदल रहे
फिर भी लैला-मजनू ,रोमियो -जूलियट ,सावित्री -सत्यवान की सीरियल में मगन रहे
जीवन सत्य से जो जितना दूर ,उतना ही लगता परिपूर्ण
ऐसा पहले कभी नहीं
क्यों सिर्फ आज ही ?
जून 2005 वसुंधरा ,
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