गरीबों का कौर
देखते हैं कुछ और सुनते हैं कुछ और ,हकीकत कुछ और होती है
मंजिल कही और चलते कहीं और ,ठौर कहीं और होती है।
बिस्तर कहीं और ,शरीर कहीं और,मन कहीं और होता है
कल जो था जेल,सेल,बेल के पीछे,आज वो निगम का महापौर होता है ,.
देखो जिसे होना चाहिए पैरो तले वो हमारा सिरमौर होता है. .
चाहते हैं कुछ और मिलता है कुछ और अरे,प्रीतिकर तो कुछ और होता है
भाता है कुछ और साथ रहता है कुछ और मिलकर तो कुछ और होता है.
सफलता कहीं और आनंद कहीं और जीतकर तो कुछ और होता है
स्वास्थ्य कहीं और ,स्वाद कहीं और ,रुचिकर तो कुछ और होता है.
दांतो में गड़ी हो जब गुठली तो रस पे कहाँ गौर होता है
बदचलन हो जब मौसम तो बृक्छ में कहाँ बौर होता है।
देह में कोई और नेह में कोई और अब कहाँ असली सात भौंर होता है
अरे! मिलता घर में सुकून कहाँ जब देखो तब सरकारी दौर होता है।
जलाता है कोई ,फलता है कोई शशी का सौंदर्य सूरज के बतौर होता है
जिस दौड़ में पागल है आज की युवा पीढ़ी वो पैकेज गरीबों का कौर होता है।
No comments:
Post a Comment