Wednesday, January 22, 2025

MAANAVATAA DASAA[ UGUMA SATAK]

 मानवता दशा 

उत्पादकता बढ़ती जोर शोर से फिर भी गरीब लाचार 

सेवा के नाम पर होती जग में दीन हीन पर अत्याचार। 

गुणवत्ता का शोर मचा है,सारे जग में भाई

पर देखो शान्ति जग में कहीं नही है छाई। 1 

              उत्पादकता का लाभ गटकते ऊँचे थोड़े लोग 

             मानवता के नाम पे करते जग का असीम भोग।

             गरीब जनता,मज़दूर,किसान मुंह बाए ऊपर ही देखे

            शायद थोड़ा लाभ हमें भी मिले तो हम भूखे भी  चखें।  2  

पैर के नीचे की धरती ,जल, जंगल,जोरू सब छीन लिया 

हथियार,नशा व सौंदर्य प्रसाधन पूरी मानवता को लील लिया। 

विकाश की क्रूरतम दशा और दिशा है उलटी भाई 

नित मानवता को रौंदते ,कुचलते जग के रहनुमाई। 3 

            भूख,रोग,कुपोषण,शोषण,हिंसा से बिलबिलाते  आए  

            संवेदनहीन,भ्रष्ट,प्रतिद्वंदी दुनिया यह किससे कहा जाए  

             खेल-तमाशे,नाच-गान भूखे पेट कभी नहीं सुहाते 

            नस्ल,रंग,धर्म,जाति  के भेद उसे कभी नहीं लुभाते। 4 

मानवता के नाशक ये सब छीनते जनता के चैन अमन 

तितली, पक्षी,पशु, पादप, पुष्प-पत्तियां नही बचे चमन 

देखें, कैसे उत्पादकता ताला  मानवता पर हो गयी है हावी 

नदियां सुखीं ,पर्वत पिघलें , गुणवत्ता की खो गयी चावी। 5 

               उत्पादकता रोज बढ़े ,बढ़ती भूखे-नंगो, कंगालों  की आबादी 

               नित नव दवा तकनीक विकसे , कुछ चाँद पर काटे चांदी 

                मान ले अगर पूरे आर्थिक जग को एक कटोरा 

                बिन पेंदे का लोटा ,भ्रष्ट उच्च वर्ग ने सब बटोरा। 6 

मज़दूर, किसान तन-मन से डाले उसमे उत्पादकता पानी 

तरसे एक बून्द को प्यासे, पर कभी  न करता कोई नादानी

रोज नयी तकनीक वादा करती कल करेगी सबकी इच्छा पूरी 

हबस करती दूनी ,रोग चौगुनी ,आवश्यकता रहती अधूरी। 7 

               सम्बन्ध सब छलनी हो गए ,हृदय हो  गए तार- तार  

                बेटा प्रवास  में जी तोड़ कमाए ,माँ घर में रोये जार -जार 

                लक्ष्य एक है -अंदर खाली, बाहर दूसरे को झूठ समझाते 

                 संतोष परम निकृष्ट धर्म है ,बढ़ाओ हबस यही सिखाते। 8 

मानव की हालत देखो ,अंदर खाली बाहर भरा पड़ा है 

बिना नीव के सतह पर जैसे ऊंचा महल खड़ा है 

हवा की हल्की झोंको से वह हीलने ,गीरने लगता है 

इसीलिए आज मानव हरदम  सुरक्षा खोज में रहता  है। 9 

               बाहर बोझ से दबा है मानव ,अंदर खाली खाली है 

               माथे पर विज्ञापन चमके ,अधर पर कृत्रिम लाली है.

               मानवता  की सुधारें दशा ,उगमा बिन नहीं कोई चारा 

               गुणवत्ता जन जन  में हो बदलें उत्पादकता की धारा। 

मानवता है  अनन्त प्रेम रस ,बिन अगाध आत्मियता सम्बन्ध न कोई 

केयरिंग व् शेयरिंग से ओत - प्रोत हों  सब ,अखण्ड जीवन रस सोई। 


जून 2010,  गाँधी दर्शन गेस्ट हाउस ,हैदराबाद  


  

   








 

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