Friday, May 9, 2025

घर और बाजार

 पहले घर था मकान नहीं इसलिए उसकी कोई कीमत नहीं

पहले था हमारा  घर सड़क से  दूर 

शांत , शुद्ध खुशहाली से भरपूर

आज मेरे मकान  का लौह दरवाजा सीधे सड़क पर खुलता है

शोरगुल के बिच हर  कोईआने वाला कुत्तेऔर दरवान  से जुझता है 

कीमतआसमान छू रहा 

मुंह मांगा दम मिल रहा

 कोई दिक्कत नहीं 

कोई दिक्कत नहीं 

पहले हम घर से निकल बाहर बाजार जाते थे 

दो पैसे में दादी का चिमटा और गुड़ की मिठाई लाते थे 

आज पहुंच गया है बाजार हमारे घर में 

छाती पर चढ़ छीन रहा जो भी है कर में 

बाजार में घर ,घर में बाजार 

बिन घर जारे स्वर्ग मिले कबीरा भया लाचार 

किसी की हिम्मत नहीं 

जो पहले  बाजार के समय और स्थान को बदल सकता था 

बाजार रामघाट पर हप्ते में शाम को एक दिन लगता था 

आज घर में ही चौबीसो घंटे बाजार लगता है 

जहाँ प्लास्टिक का सदाबहार फूल खूब फबता है 

बाजार का कमाल कि 

बरसात में बसंत और ग्रीष्म में हेमंत 

कोयल की टीबियाई  कूक और पसीने का अंत 

कोई इज्जत नहीं 

पहले पानी हवा भोजन अतिथि को नहीं थे बिकाऊ 

शरीर क्या आज आत्मा ,चरित्र,आस्था,धर्म,ईश्वर 

रिश्ते नाते कुछ भी नहीं टिकाऊ 

सब बाजार में कार की मॉडल की तरह बदल रहे  

फिर भी लैला मजनू रोमिओ जूलियट सावित्री सत्यवान 

की सीरियल कहानी में मगन रहे 

जीवन से जो जितना दूर 

लगता उतना परिपूर्ण 

क्या पहले भी था 

या सिर्फ आज ही ?












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