हम नही जानते
किस देश मे रहते हैं?
किस वेश में रहते हैं ?
किस परिवेश में रहते हैं ?
हम नहीं जानते हैं
न किसी वेष को मानते हैं
न किसी बोली को पहचानते हैं
तो कैसे पूछे कुशल क्षेम
विना बोध के कहा होता है प्रेम।
प्रेम भी नहीं ,ज्ञान भी नही
मनुज होने का स्वाभिमान भी नही
तो क्यों हम पेड़ या सब्जी की तरह ज़िंदा हैं
लोमड़ी और खरगोश की तरह भयभीत और शर्मिंदा हैं।
धरती के पानी को सोखते
सूरज के अंशु को ओढ़ते
सिर्फ आंधी के प्रबल प्रवेग में ही
हमारी पत्तियां पड़ोसी के पत्तों को छू पाती
या सिर्फ भयंकर बाढ़ या तूफ़ान में ही हम टूटते
एक दूसरे पर गिरते, पड़ते
प्रकृति का यह कैसा खेल
सिर्फ प्रलय में ही होता मेल।
15 अप्रैल 1995 , होटल कनिष्क, दिल्ली
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