Wednesday, January 22, 2025

HAM NAHI JAANATE- 2

 हम नहीं जानते 

क्या होती है

 सत्य की आशा ?,ज्ञान की पिपासा ?धर्म की जिज्ञाशा ?

ईश्वर की परिभाषा ? प्रेम की अभिलाषा ?

हम नहीं जानते और जानना भी नही चाहते ,

सिर्फ इतना मानते है कि हमारा जीवन 

सत्य,ज्ञान ,धर्म,ईश्वर,प्रेम से ओत -प्रोत है। 

और ये सभी चैतन्य के शास्वत जोत हैं 

इनके बिना हमारा जीवन ही आभाव  है 

जैसे पानी बिन मीन का स्वाभाव है। 

वाद-विवाद ,तर्क-वितर्क में पड़े वो 

जो कही और अटके और उलझे हैं  

हम तो एक हो आनंद रास चूस रहे 

प्रति क्षण हम टटके एवं सुलझे हैं ,

जो है शाश्वत,असीम,नित्य-नवीन 

उसे ढालते, मन के सांचे में 

करते छोटा,छुद्र बन जाते प्रवीण

फिर अपने मन की बात कहते,थोपते 

और करते विविध रूप में बखान 

ऐसे बनते मसीहा और महान। 

परन्तु हम एक छोटा सा अदना आदमी 

उसी को पहनते,ओढ़ते ,खाते,पीते,जीते  

बिना उसे जाने साथ नित्य रहते 

जो हो परे उसे ही जाना जा सकता है 

स्वयं को कैसे पहचाना जा सकता है ?

हम नित्य नवीन हो उनके संग बहते हैं 

सत्य,ज्ञान,धर्म,ईश्वर,प्रेम के संग रहते हैं 

कोई पूछता है ,आप इन्हे मानते, पहचानते ?

नहीं ,हम इन्हे जीते हैं ,हम कुछ नहीं जानते।

28 जून 1995 ,त्रिवेणी इंजीनियरिंग,खतौली ,मुज़्ज़फरनगर  

 




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