मुखौटा
जो खाने में मजेदार पचाने में बड़ा कठिन होता है ,
ऊपर से उबड़ खाबड़ वो अंदर से महीन होता है
अधर पर मधुर मुस्कान,ह्रदय में हलाहल
बताये कोई,क्यों उसी पर यकीन होता है ?
पुराने पेड़ को क्यों छोड़ दिए बूढा समझकर
मौसम आने पर फिर से वही तो नवीन होता है
जो दूर से लगता था खुला खुला ,फैला फैला
पास आओ तो देखो वो कितना गझीन होता है ?
लापरवाही से दबा देते हैं जिसे हल्काऔर छोटा समझकर
वक्त आने पर वह मुद्दा बड़ा संगीन होता है
माघ की रात में जिन मासूम हड्डियों ने सहा है सर्द हिलोरें
वही जानती है फागुन का नरम धूप कितना रंगीन होता है..
No comments:
Post a Comment