Wednesday, May 28, 2025

सिन्दूर

         सिन्दूर   

रगों में दौड़ते रहने के हम नहीं कायल ,

जो आँखों से न टपके वो लहू क्या है ?   ग़ालिब  

अब तो मांग में भी भरे जाने के नहीं  लायक  ,

जो रगों में दौड़कर लहू को ठंढा न कर दे वो सिन्दूर क्या है ?

जो न करा दे जग हसाई ,हाथ पैर में हथकड़ी बेडी न लगवाई 

जिससे न  बिलखें बहनें  और सब लुगाइ,वो फितूर क्या है?

जो न चुनाव जीतवा दे,ललाट के लाल टीके को हरा न  करवा दे 

जो नया भारत ,हिंदुस्तान  न बनवा दे  

वो  ननबायोलॉजिकल डंकापति हुजूर क्या है ?

जहाँ सत्ता के सामने संविधान ,समाज ,सिपाही सभी हों समर्पित 

वहां ओक्टोपसीय नंगे राजा का कसूर क्या है?

27 मई  2025 वसुंधरा 






I RAN

"I ran, because I can"

You can't ,because you aren't

Those who ran, should understand

Run is not only physical

It's also logical,mental,and spiritual

Run,run,run not only physically 

Daily,weekly,monthly and yearly

but logically,mentally,spiritualy,

And also instantly .

25 May 2025 Vasundhara Indirapuram canal



Friday, May 23, 2025

गरीबों का कौर ( MORSHEL OF POOR)

               गरीबों  का कौर 

देखते हैं कुछ और सुनते हैं कुछ और ,हकीकत कुछ और होती है 

मंजिल कही और चलते कहीं और ,ठौर कहीं और होती है। 

        बिस्तर कहीं और ,शरीर कहीं और,मन कहीं और होता है 

        कल जो था जेल,सेल,बेल के पीछे,आज वो निगम का महापौर होता है ,. 

        देखो जिसे होना चाहिए पैरो तले वो हमारा सिरमौर होता है. . 

चाहते हैं कुछ और मिलता है कुछ और अरे,प्रीतिकर तो कुछ और होता है 

भाता है कुछ और साथ रहता है कुछ और  मिलकर तो कुछ और होता है.

 सफलता कहीं और आनंद कहीं और जीतकर तो कुछ और होता है 

स्वास्थ्य कहीं और ,स्वाद कहीं और ,रुचिकर तो कुछ और होता है. 

         दांतो में गड़ी हो जब गुठली तो रस पे कहाँ गौर होता है 

         बदचलन हो जब मौसम तो बृक्छ  में कहाँ बौर होता है। 

देह में कोई और नेह में कोई और अब कहाँ असली सात भौंर होता है 

अरे! मिलता घर में सुकून कहाँ जब देखो तब सरकारी दौर होता है। 

         जलाता है कोई ,फलता है कोई शशी का सौंदर्य सूरज के बतौर होता है 

         जिस दौड़ में पागल है आज की युवा पीढ़ी वो पैकेज गरीबों का कौर होता है। 












पेड़ का प्रश्न ( QUESTION OF TREE)

             पेड़ का प्रश्न 

मैंने पेड़ से पूछा 

तुम क्यों मेरे जन्म के पूर्व से ही खड़े हो ?

क्यों नहीं टूटते ,गिरते ,सड़ते 

दूसरे पेड़ो से लड़ते ?

कितनी ही प्रचंड आंधियां ,भयंकर तूफ़ान एवं बाढ़ आये 

वह रहा चुपचाप खड़ा 

मेरे सवाल का जवाब दिया 

और मुझसे ही प्रश्न जड़ा 

बसंत में हम सभी हंसते हैं  ,पतझड़ में झड़ते हैं 

एकसाथ सभी खिलते हैं ,फूलते हैं ,फलते हैं 

आंधी में साथ ही हिलते हैं 

इसलिए कि 

पतझड़ में हंसाने ,बसंत में रुलाने 

आंधी में झूठे धीरज बंधाने 

और विकाश की सही दिशा दिखाने 

हमारा कोई नेता नहीं होता 

तुम सदियों से अपना नेता क्यों चुनते हो ?




मुखौटा (MASK)

                 मुखौटा 

जो खाने में मजेदार पचाने में बड़ा कठिन होता है ,

ऊपर से उबड़ खाबड़ वो अंदर से महीन होता है 

अधर पर मधुर मुस्कान,ह्रदय में हलाहल 

बताये कोई,क्यों उसी पर यकीन  होता है ?

पुराने पेड़ को क्यों छोड़ दिए बूढा समझकर 

मौसम आने पर फिर से वही तो नवीन होता है 

जो दूर से लगता था खुला खुला ,फैला फैला 

पास आओ तो देखो वो कितना गझीन होता है ?

लापरवाही से दबा देते हैं जिसे हल्काऔर छोटा समझकर 

वक्त आने पर वह मुद्दा बड़ा संगीन होता है 

माघ की रात में  जिन मासूम हड्डियों ने सहा है सर्द हिलोरें 

वही जानती  है फागुन  का नरम  धूप  कितना रंगीन होता है.. 















श्रमिक (LABOUR)

                                               श्रमिक 

विश्व सभ्यता के वास्तविक निर्माता ,मानवता के भाग्य विधाता 

श्रमिक, तुम्हे नमस्कार ,सत बार , सहश्र बार, बार- बार ,

हर बार तुम्हारी चरण बन्दना करता मै हे ! कामगार !1 

जो ईमानदार है, श्रम करता है , जो झूठा ,फरेबी वो भ्रम रचता है 

श्रमिक हवश से दूर रहता है ,संतोष धन से भरपूर रहता है। 

करुणा से प्रेरित हो,  करता है कारबार 

तुम्हारी चरण  . . . . 2 

श्रम से ही कुदाल ,फावड़े ,हल,मज़दूर बनाते 

किसानो के संग मिल होली, बिरहा ,कजरी गाते 

पसीने बहाते दिन में ,रात में  गहरी नींद पाते 

न छल,छद्म,न झूठ ,फरेब ,न करते वे घाते 

कुदरत से सिख अपने विवेक विश्वास को करते वे धारदार 

तुम्हारी चरण वंदना ,,,,,,,,,,,,3 

श्रम स्वधर्म है ,श्रम स्वाभाव है ,तन, मन ,जीवन में यही भाव है 

सेवा के सिवा कोई नहीं चाव है 

पाने को सर्वस्व ,खोने को कुछ नहीं दाव है,

श्रमिक, तुम स्वस्थ,सुन्दर,सुडौल,और शानदार 

जीवित और जानदार 

तुम्हारी चरण वन्दना करता मै हे ! कामगार 

/सात बार शहस्र बार ,बार, बार ,हर बार 

श्रमिक तुम्हे नमस्कार।  4 


रामेश्वर दुबे ,
25  मई 2016 ,( आकाशवाणी ,लखनऊ के श्रमिक जगत कार्यक्रम में प्रसारित) 











 

मौत (DEATH)

                मौत     

साँस का बंद होना ही मौत नहीं है ,

ज़बान का बंद होना भी मौत है। 

अपनी आँखो से न दिखना भी और 

अपनी कानो  से न सुनाई पड़ना भी मौत है। 

मायावी द्वारा दिखाए गए करतब 

को ही सिर्फ देखना मौत है 

और उसकी अपनी ही मन 

की बात सिर्फ  सुनना भी मौत है। ,

साँस बंद होना शरीर की  मौत है 

ज़बान बंद होना आत्मा की मौत है 

आत्मा पहले मरती है , शरीर बाद में। 

22 मई 2025 ,वसुंधरा