Saturday, May 16, 2020

EK PROMOTION SADHE TERAH TRANSFER-2

                                          एक प्रोमोशन साढ़े तेरह ट्रांसफर
नेह स्नेह की करके बातें ,हमको क्यों नाहक फुसलाते
आज बिन पद , पैसा के कहाँ ,कौन प्रतिष्ठा पाते ?
हीरे  की हार की छोड़ें बात,एक सिल्वर की बिछिया भी तो लाते ?
घर में मेहनत करके मरी जा रही
बत्तीस बरस में काश!  कभी एक कामवाली रख पाते!
जाइये  बाहर , औरों  की तरह ओढ़िये खोल
अन्यथा मैं  खोलूंगी  अब आपकी पोल --
बाइस बरष में एक प्रोनत्ति,साढ़े तेरह तबादला
आपके जिंदगी की यह उपलब्धि क्या कम रही ?
एक प्रोमोशन साढ़े तेरह ट्रांसफर ,सुना, देखा आपने कहीं
मैं तो झेल रहा हूँ वही , मैं तो  भोग रहा हूँ वही।  ५
यह व्यंग्य सुन मै हुआ मौन ,आखिर अब सम्बल देगा कौन
स्वर्णाभूषण ,सारी सुख सुविधा तो मिल सकती है ,
क्या मेरी अंतरात्मा अंदर थोड़ी हिल सकती है ?
हिल सकती है --
पर मन बेचैन, चित में अंतर्द्वंद भरा भरा होगा
कहीं काला ,कही सफ़ेद ,कहीं लाल ,हरा होगा
झंझावाती मन और म्लान मुख,
देख न सकी देर तक मेरा दुःख ,
बोलीं --
अरे! किस दुःख दुविधा में पड़ गए ,
किस पीड़ा, संताप में आप गड़  गए,
हम करते हैं श्रम ,हमारा सेहत ठीक
क्यों पसारे हाँथ और मांगे किसी से भीख ,
वणिक या कुटिल बुद्धि में
है कहीं थोड़ी भी आनंद दीख !
आप हैं नारियल ,बेर क्यों बनें ,यही  तो आतंरिक आकर्षण
शरीर स्वस्थ ,चित्त स्थिर , मन तो है आपका स्वक्छ दर्पण 
आप जहाँ हैं वहीँ खड़े रहें
उसी संघर्ष पथ पर अड़े रहें
पर आप तो नास्तिक
करती मैं भगवान् से रोज पूजा, प्रार्थना कि
वे बदले आपको कभी नहीं ,कभी नहीं ,कभी नहीं।
एक प्रोमोशन  ,साढ़े तेरह ट्रांसफर सुना ,देखा आपने कहीं
मैं तो झेल रहा हूँ वही , मैं तो भोग रहा हूँ वही।



Thursday, May 7, 2020

APNI DIARY SE ( 22 FEBRUARY 2005)

                                        अपनी डायरी  से     ( 2 2 फरवरी 2005 )

आज हबीब  तनवीर जी का नाटक "चरणदास चोर " दयाल सिंह कॉलेज ,ऑडिटोरियम, नई दिल्ली में देखा। नाटक ने बहुत प्रभावित किया। चरण दास चोर बने गोविंद राम जी से भी बात किया। नाटक बहुत ही उत्कृस्ट था। अंत में हबीब तनवीर जी द्वारा दिया गया भाषण  भी। कला ,साहित्य विरोध की पृस्ठभूमि तैयार करते हैं। विरोध एक दिन क्रांति बन जाता है। हर कलाकार ,साहित्यकार स्वभावतः प्रकृतिस्थ ,कुदरती तौर पर व्यवस्था विरोधी होता है। जो नहीं है,वह चाटुकार है। कला और साहित्य व्यवस्था पूजक या पोषक हो ही नहीं सकता। जँहा ऐसा हुआ ,वह समाज ,राज मृत हो जाता है। आज नहीं तो कल। हर सत्य का यही हस्र  होता है ;जीवन में विरोध का सामना ,मरने पर आम लोगो द्वारा और विरोधियों द्वारा भी पूजा जाना। सिर्फ पूजा जाना ,आचरण नहीं। क्योंकि वह उनकी शक्ति के बाहर होता  है। यह हस्र हुआ -सुकरात का ,ईशा मशीह का ,गाँधी का और चरण दास चोर का भी।
रामेश्वर दुबे
7 मई 2020 ( स्मृति 22  फरवरी 2005 )

Tuesday, April 28, 2020

karmveer (KARMVEER)

                                                        कर्मवीर
कैसे छोड़ें अपनी मेहनत ,कोई  बता दे आज हमको
सबने अपने धर्म को छोड़ा, अंतर्तम और मर्म को तोड़ा
कैसे छोड़े अपनी नियत, कोई बता दे आज हमको।
                         पसीने बहाकर खाते कमाई ,कवि करते हौसला अफ़जाई ,
                         सूरज ,बादल,वायु  से मिताई ,तपकर ,बहकर करते भलाई ,
                         कैसे छोड़े अपनी कुदरत कोई बता दे आज हमको।
संजोकर रखते विरासत थाती ,गुलामी नहीं है हमको भाती ,
मारो गोली धरम, जाती  , दूर रहो सब आतम  घाती ,
कैसे फोड़ें अपनी किस्मत ,कोई बता दे आज हमको।
                        नहीं भरोसा इनकी नेकी में ,पर सर अपना इनकी ढेकी में ,
                        बल है सिर्फ अपनी एकी  में
                         कैसे बताए अपनी दिक्कत ,कोई बता दे आज हमको।
गाँवों में ढेले फेकते ,कस्बों में ठेले लगते ,
शहरों में मेले लगते ,घंटो खटते धेले मिलते ,
मांगो तो थाने, जेलें मिलते
कैसे छोड़े अपनी कीमत ,कोई बता दे आज हमको।
                        धर्म नहीं तुम कर्म ही दे दो ,योग क्षेम का मर्म ही दे दो ,
                         बियर ,पेप्सी,  नहीं जल गर्म ही दे दो
                        बच्चों को दो रोटी नर्म  ही दे दो ,
                        और नहीं हमसे थोड़ी शर्म ही ले लो ,
                         कैसे छोड़े अपनी इज्जत कोई बता दे आज हमको।
उत्पादकता के मस्तक है हम ,गुणवत्ता के सर्जक है हम
मानवता के रक्षक है हम
कैसे छोड़े अपनी हिम्मत कोई बता दे आज हमको।
कैसे छोड़े अपनी मेहनत ,कोई बता दे आज हमको।

रामेश्वर दुबे ,
25  मई 2016 ,( आकाशवाणी ,लखनऊ के श्रमिक जगत कार्यक्रम में प्रसारित) 

Saturday, July 27, 2019

श्रम से सृजन  सृजन से सेवा , सभी को मिले उत्पादकता मेवा
श्रम से जब उत्पादकता बढ़े , सेवा समृद्धि  , सदा  ऊपर चढ़े
सम्यक वितरण ख़ुशी गढ़े , सभी प्रेम की पुस्तक पढ़ें
शांति फैले  गुणवत्ता के ज्ञान से , प्रेम पनपे मानवता के मान से
श्रम , पूंजी , प्रबन्धन  से सबका हो कुशल क्षेम
उतपादकता , गुणवत्ता , मानवता , से सेवा , शांति , प्रेम 

Monday, October 14, 2013

EK PROMOTION SADHE TERAH TRANSFER-1

एक प्रोमोशन  साढ़े तेरह ट्रान्सफर 

एक प्रोमोशन  साढ़े तेरह ट्रान्सफर
सुना, देखा आपने कहीं
मैं तो झेल रहा हूँ वही
मैं तो भोग रहा हूँ वही।

बाईस बरस बीत गये, यह पुरानी बात है
बस एक  प्रोन्नति, साढ़े तेरह तबादला
जिसे मैं कहता हूँ दिन, वे कहते रात है,
अफसर हो ,सरकारी नौकर हो ,कवि हो ,
ब्राह्मण हो ,बनिया हो ,हरिजन हो,
हिन्दु हो,मुसलमान हो ,गिरिजन हो
वे रोज पूछते -क्या तुम्हारी जात है ,
और क्या तुम्हारी औकात है?
मौन ही रह करुण मन आक्रोश में कहता
आपके दिए पीड़ा, कष्ट
हमारी स्वतंत्रता के सौगात हैं ,
मै सबकुछ हूँ या कुछ भी नहीं।
एक प्रोमोशन  साढ़े तेरह ट्रान्सफर
सुना, देखा आपने कहीं
मैं तो झेल रहा हूँ वही
मैं तो भोग रहा हूँ वही।

पत्नी कहतीं -महामूर्ख हैं आप
अपने मन के राजा हैं ,
चोर ,चूहेडे  ,कुत्ते ,कम पढ भी
रोज बजाते आपके बाजा हैं
घर मे जितना मुझे बोल लीजिए
अपने मन की भङास खोल लीजिए ,
बाहर तो कुछ कर पाते नही
उनके आगे दाल गल पाते नही
अन्यथा बाईस बरस बीत गए
और एक भी प्रोमोशन हाथ आते नही,
उसके ऊपर साढ़े तेरह तबादला
अरे! डूब मरने को  चुल्लू   भर पानी है कही.
एक प्रोमोशन  साढ़े तेरह ट्रान्सफर
सुना, देखा आपने कहीं
मैं तो झेल रहा हूँ वही
मैं तो भोग रहा हूँ वही। 

मैं प्यारी पत्नी को समझाता 
देखें, जीवन मे कितना आनन्द है आता 
जब ह्रदय करुणित ,मन संतोषी 
फिर क्यों ढूँढे कहाँ, कौन है दोषी 
जो होने होते है वही होते हैं 
आज मै हँसता हूँ वे रोते हैं 
हम वही काटते हैं जो बोते हैं 
अहा! हम क्या पाते हैं, क्या खोते हैं 
फिर भी मेरे प्रतिबद्धता ,प्यार ,समर्पण 
में कोई कमी तो नहीं 
एक प्रोमोशन  साढ़े तेरह ट्रान्सफर
सुना, देखा आपने कहीं
मैं तो झेल रहा हूँ वही
मैं तो भोग रहा हूँ वही। 

Wednesday, August 17, 2011

इन्कलाब

पूर्वजों के आंसुओं से हुए
गीले गमछे अभी सूखे कहाँ हैं ? १
आजादी मिली आधी, अँधेरी रात में
इसीलिए तो दिखते नहीं भूखे कहाँ हैं ?
इंडिया की तरक्की से चकित लोग
भारत के नौजवान अभी उठे कहाँ हैं ? ३
गगनचुम्बी लहलहाती बिल्डिंगों में
खोजता है किसान उसके भुट्टे कहाँ हैं ? ४
स्वचालित मशीनों के दबाव में
मजदूरों के पसीने अभी छूटे कहाँ हैं ? ५
जमींन में गहरेगड़े हैं बीज आजादी के
उसकी कोंपले अभी फूटी कहाँ हैं ? ६
मन की बात हरदम मन के बाहर
मन के अंदर अभी घूटी कहां है ? ७
संसदीय गर्जना , कानूनी बिजली से
भ्रष्टाचारियों के रिश्ते अभी टूटे कहाँ हैं ? ८
हमारा इमानदार मुखिया रखता है मौन व्रत
खोजते रहो बेईमान, झूठे कहाँ हैं ? ९
सारी सियासत जहाँ की तहां धरी रह जाएगी
अरे ! हिन्दू मुसलमान अभी जुटे कहाँ हैं ? १०
स्वतंत्रता दिवस आते रहे हैं बार-बार, कईबार
असली इन्कलाब हमने अभी ढूंढे कहाँ हैं ? ११

Monday, March 22, 2010

GUNWATTA पचासा [UGUMA SATAK]

गुणवत्ता  पचासा 
सवास्थ्य, सौन्दर्य, आनंद आज नहीं है उपलब्ध, गुणवत्ता की मांग है
बिन मानवता उत्पादकता नहीं चाहिए ,नहीं चाहिए। १
नींद आती नहीं आज बिना गोली के, गूल की मांग है
बिना सुसुप्ति सयन नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । २
अजब का आकर्षण है इन आँखों में ,पर हृदय की मांग है
बिना करुना नयन नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । ३
प्रवाह में पूंजी के बह चले , बिक चले ,शास्त्र की मांग है
बिना सम दृष्टी निर्णय नहीं चाहिए ,नहीं चाहिए। ४
भ्रष्ट  है आचरण नर ,नारी , युवा की ,युग की मांग है
बिना प्यार प्रणय नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । ५
आज बच्चे दबे है बस्तों की  बोझ से , बचपन की मांग है
बिना स्वप्न सृष्टि  नहीं     चाहिए , नहीं चाहिए । ६
धर्मो , मतों , दलों में बटा   यह जगत , आम जन की मांग है
बिना दर्द दृष्टि नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । ७
चल रहा शोषण , कुपोषण विश्व के गाँव में , ऐश्वर्य की मांग है
बिना श्रम संपत्ति नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । ८
रूप , धन के आकर्षण से भरा यह संसार , सौन्दर्य की मांग है
बिना प्रेम दंपत्ति नहीं चाहिए , नहीं चाहिए ।
सत्य बाणी  का आभाव है आजकल , आनंद की मांग है
बिना प्यास पानी नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । १०
आज कवियों , लेखकों की भरमार पुरे संसार में , साहित्य की मांग है
शब्द बिना मानी नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । ११
अणु और अंतरिक्ष में लाख खोज करते रहें , जीव की मांग है
बिना अध्यात्म विज्ञान नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । १२
धर्म, इश्वर का ठेका लिए ठाट से घूमते रहे, दिन - दुखियों की मांग है
बिन भोजन -दवा ,आत्मज्ञान नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । १३
सत्ता ,संपत्ति के याचक भरे हैं मगर मानवता की मांग है
बिना कर्तव्य अधिकार नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । १४
बम , तोपों के जखीरे किये कायरों ने खड़े  , वीरता की मांग है
बिना साहस हथियार नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । १५
नदी ,नालों को बांध किये वारी बोतल में बंद ,सूखे बादलों की मांग है
बिना निति एकल व्यापार नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। १६
कहीं मौत अन्न के अभाव में ,कही सैर अन्तरिक्ष में , अहिंसा ,शांति की मांग है
बिना संतुलन संसार नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । १७
अहं  में तड़पते विद्वान गरजते , पर शिष्य की मांग है ,
विनय बिना विद्या नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । १८
आज श्रेष्ठ गुरुजन भी हैं ,भ्रष्ट टीचर भी हैं ,पर शिक्षा की मांग है
बिना आदर्श शिष्य और शिष्या नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। १९
रोग, गरीबी से रहा मर देश आज यह , स्वास्थ्य की मांग है
बिना भूख भोजन नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । २०
अन्याय से भरा यह जग औ धरा , न्याय की मांग है
बिना न्याय- युद्ध यौवन नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। २
सुख, सुविधाओं से सजे हैं पूंजिपत्तियों के घर ,निर्धन श्रमिकों की मांग है
बिना पूंजी वितरण उत्पादकता नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। २२
सिर्फ नारे औ हड़ताल से पूंजी बढती नहीं ,हर उद्यमी की मांग है
बिन उत्पादकता -बृद्धि  श्रम,शक्ति औ संगठन नहीं चाहिए,नहीं चाहिए। २३
विश्व तो गाँव हुआ नहीं पर गाँव बने विश्व की मांग है
बिन अन्न ,पानी ,हवा कंप्यूटर , मोबाइल नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। २४
अन्तरंग हुआ ध्वस्त ,बहिरंग दिखे मस्त  पर सेहत की मांग है
बिना चरित्र सुख, संपत्ति नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । २५
हो रहा रोज आविष्कार ,वैज्ञानिकों की भरमार पर विवेक की मांग है
बिना चरित्रवान ज्ञानवान नहीं चाहिए,नहीं चाहिए। २६
घरों में सजे दुकान कतारों में, अरबपति बढ़ रहे हजारों में,किसान ,मजदूरों की मांग है
बिना नैतिकता व्यापार नहीं चाहिए , नहीं चाहिए। २७
हबस को जगाओ मत ,नियम को सुलाओ मत ,समस्त जगत की मांग है
बिना आवश्यकता बाज़ार नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। २८
बढ़ते तकनोलोजी से जीव को कस्ट  ,पर्यावरण हो रहा नस्ट  ,हर जीव की मांग है
बिना मानवता विज्ञानं नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। २९
हो रहे पग पग पर खड़े ,मंदिर ,मस्जिद ,गिरिजघरें ,धर्म की मांग है
बिना त्याग ,विराग पूजा, अजान नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । ३०
पूँजीवाद,साम्यवाद जाती- रंग-वर्ग-धर्मवाद ,सब विवाद ही विवाद ,समाज की मांग है
बिना सत्य और सिंद्धांत राजनीती नहीं चाहिए ,नहीं चाहिए । ३१
मकान बड़े- बड़े ,परिवार छोटे-छोटे,दिल तो खोटे -खोटे , शांति की मांग है
बिना खाली समय सुबिधा, सामान नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। ३२
अब जितने विशेषज्ञों की भरमार ,बढ़ रही समस्याएँ उतनी अपरम्पार ,समाधान की मांग है
बिना सहकार प्रतिद्वंदिता नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । ३३
चाँद पर जाना अब सुलभ ,पडोसी का घर हो गया दुर्लभ ,मानवता की मांग है
बिना संवेदन, सरोकार विकाश नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । ३४
टीवी, इन्टरनेट ,मोबाइल के दहाड़ ने किये खड़े सूचनाओं के पहाड़ ,पर निश्छल मन की मांग है
बिना सम्बन्ध बात , परिवार, समाज नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। ३५
खाते फास्ट फ़ूड ,पाचन शक्ति अवरुद्ध ,पर करते 'फील गुड', आज माट्टी की मांग है
बिना अपनी बोली,भाषा ,संस्कृति, 'विदेशी सरकार' नहीं चाहिए, चाहिए। ३६
कंपनियों के लाभ खूब बढ़ रहे, चंद लोगों के लोभ चढ़ रहे, छंटते मजदूरों की मांग है
बिना सम्यक लाभ वितरण औद्योगीकरण नहीं चाहिए, नहीं चाहिए।३७ 
आज लोग बढ़ रहे, मनुष्य घट रहे, मानवता की मांग है
बिना गुणवत्ता , उत्पादकता नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। ३८
अब घर नहीं,द्वार नहीं, सिर्फ मकान और दूकान है ,
नहीं अब दालान / , खिड़की ही खिड़की से होता आदान -प्रदान ,पडोसी की मांग है
बिना प्यार संवेदनहीन संसार नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। ३९ 
लोभ लाभों में पड़कर सभी है विक्षिप्त ,बिना मन पे अंकुश दिल कैसे हो तृप्त 
आज मानवता की मांग है ,बिना योग भोग नहीं चाहिए ,नहीं चाहिए ४० 
रक्तचाप, तनाव से भयभीत , निरोगता की मांग है
जल्दीबाजी से जर्जर, जटिल जीवन नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। 
महत्वाकंक्छा से सभी अतृप्त ,बिना मन पे अंकुश दिल कैसे हो तृप्त, मानवता की मांग है
बिना कर्म योग भोग नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। 
चाहिए शांति ,सुख ,आनंद तो करे सभी को पसंद , उगुमा की मांग है
बिना योग, बोध, प्रेम लोग नहीं चाहिए , नहीं चाहिए। ४१ 
अब व्यापारियों/धनिकों  में एकता,मज़दूरों /गरीबो में फूट
इसी से संसार में मची है लूट ,
पर विश्व एकता की मांग  है  ,बिन सम्यक धन वितरण 
खुला व्यापार नहीं चाहिए ,नहीं चाहिए ४२ 
पूंजीवाद में सबकुछ बिकाऊ है,
साम्यवाद में कुछ नहीं टिकाऊ है ,
मानव वाद की मांग है मूल्यहीन,संवेदनहीन संसार नहीं चाहिए,नहीं चाहिए ४३ 
विज्ञापन का जोर है 
संत वही जो सबसे बड़ा चोर है 
समझदारी की मांग है 
बिना अनुभव -ज्ञान प्रवचन नहीं चाहिए ,नहीं चाहिए ४४ 
राजा को ईमान नहीं 
प्रजा को दिमाग नहीं,
प्रजातंत्र की मांग है 
बिना सत्य धारे ,लुभावन नारे नहीं चाहिए ,नहीं चाहिए ४५ 
विवेक का आदर नहीं ,बल का सदुपयोग नहीं 
विकाश की मांग है 
बिन आत्म निरीक्षण सर्व भक्षण नहीं चाहिए नहीं चाहिए ४६  
गायब है प्रकृति में सौंदर्य , और कार्य में आनंद 
मानवता की मांग है 
बिना आत्मीयता सम्बन्ध ,बिना रास जीवन नहीं चाहिए नहीं चाहिए,४७ 
शरीर में श्रम नहीं,मन में संयम नहीं ,अभिमान सुण्य अहं की मांग है 
बिना विवेक बुद्धी ,अनुरागहीन ह्रदय नहीं चाहिए नहीं चाहिए 48
आज व्यक्ति से ज्यादा वस्तु ,वस्तु से ज्यादा सिक्के  का है महत्व 
पर जीवन की मांग है बिना सत्य,प्रेम ,विवेक,तर्क नहीं चाहिए, नहीं चाहिए ४९ 
आवश्यकता की पूर्ति हो,,इच्छा की निवृति हो ,
मानवता की मांग है ,हम कुछ नहीं ,हमारा कुछ नहीं,
हमें कुछ नहीं चाहिए , नहीं चाहिए ५० 
[स्वास्थ्य ,सौंदर्य आज नहीं है उपलब्ध ,गुणवत्ता की मांग है ,
बिना मानवता उत्पादकता नहीं चाहिए नहीं चाहिए ]