एक प्रोमोशन साढ़े तेरह ट्रांसफर
नेह स्नेह की करके बातें ,हमको क्यों नाहक फुसलाते
आज बिन पद , पैसा के कहाँ ,कौन प्रतिष्ठा पाते ?
हीरे की हार की छोड़ें बात,एक सिल्वर की बिछिया भी तो लाते ?
घर में मेहनत करके मरी जा रही
बत्तीस बरस में काश! कभी एक कामवाली रख पाते!
जाइये बाहर , औरों की तरह ओढ़िये खोल
अन्यथा मैं खोलूंगी अब आपकी पोल --
बाइस बरष में एक प्रोनत्ति,साढ़े तेरह तबादला
आपके जिंदगी की यह उपलब्धि क्या कम रही ?
एक प्रोमोशन साढ़े तेरह ट्रांसफर ,सुना, देखा आपने कहीं
मैं तो झेल रहा हूँ वही , मैं तो भोग रहा हूँ वही। ५
यह व्यंग्य सुन मै हुआ मौन ,आखिर अब सम्बल देगा कौन
स्वर्णाभूषण ,सारी सुख सुविधा तो मिल सकती है ,
क्या मेरी अंतरात्मा अंदर थोड़ी हिल सकती है ?
हिल सकती है --
पर मन बेचैन, चित में अंतर्द्वंद भरा भरा होगा
कहीं काला ,कही सफ़ेद ,कहीं लाल ,हरा होगा
झंझावाती मन और म्लान मुख,
देख न सकी देर तक मेरा दुःख ,
बोलीं --
अरे! किस दुःख दुविधा में पड़ गए ,
किस पीड़ा, संताप में आप गड़ गए,
हम करते हैं श्रम ,हमारा सेहत ठीक
क्यों पसारे हाँथ और मांगे किसी से भीख ,
वणिक या कुटिल बुद्धि में
है कहीं थोड़ी भी आनंद दीख !
आप हैं नारियल ,बेर क्यों बनें ,यही तो आतंरिक आकर्षण
शरीर स्वस्थ ,चित्त स्थिर , मन तो है आपका स्वक्छ दर्पण
आप जहाँ हैं वहीँ खड़े रहें
उसी संघर्ष पथ पर अड़े रहें
पर आप तो नास्तिक
करती मैं भगवान् से रोज पूजा, प्रार्थना कि
वे बदले आपको कभी नहीं ,कभी नहीं ,कभी नहीं।
एक प्रोमोशन ,साढ़े तेरह ट्रांसफर सुना ,देखा आपने कहीं
मैं तो झेल रहा हूँ वही , मैं तो भोग रहा हूँ वही।
नेह स्नेह की करके बातें ,हमको क्यों नाहक फुसलाते
आज बिन पद , पैसा के कहाँ ,कौन प्रतिष्ठा पाते ?
हीरे की हार की छोड़ें बात,एक सिल्वर की बिछिया भी तो लाते ?
घर में मेहनत करके मरी जा रही
बत्तीस बरस में काश! कभी एक कामवाली रख पाते!
जाइये बाहर , औरों की तरह ओढ़िये खोल
अन्यथा मैं खोलूंगी अब आपकी पोल --
बाइस बरष में एक प्रोनत्ति,साढ़े तेरह तबादला
आपके जिंदगी की यह उपलब्धि क्या कम रही ?
एक प्रोमोशन साढ़े तेरह ट्रांसफर ,सुना, देखा आपने कहीं
मैं तो झेल रहा हूँ वही , मैं तो भोग रहा हूँ वही। ५
यह व्यंग्य सुन मै हुआ मौन ,आखिर अब सम्बल देगा कौन
स्वर्णाभूषण ,सारी सुख सुविधा तो मिल सकती है ,
क्या मेरी अंतरात्मा अंदर थोड़ी हिल सकती है ?
हिल सकती है --
पर मन बेचैन, चित में अंतर्द्वंद भरा भरा होगा
कहीं काला ,कही सफ़ेद ,कहीं लाल ,हरा होगा
झंझावाती मन और म्लान मुख,
देख न सकी देर तक मेरा दुःख ,
बोलीं --
अरे! किस दुःख दुविधा में पड़ गए ,
किस पीड़ा, संताप में आप गड़ गए,
हम करते हैं श्रम ,हमारा सेहत ठीक
क्यों पसारे हाँथ और मांगे किसी से भीख ,
वणिक या कुटिल बुद्धि में
है कहीं थोड़ी भी आनंद दीख !
आप हैं नारियल ,बेर क्यों बनें ,यही तो आतंरिक आकर्षण
शरीर स्वस्थ ,चित्त स्थिर , मन तो है आपका स्वक्छ दर्पण
आप जहाँ हैं वहीँ खड़े रहें
उसी संघर्ष पथ पर अड़े रहें
पर आप तो नास्तिक
करती मैं भगवान् से रोज पूजा, प्रार्थना कि
वे बदले आपको कभी नहीं ,कभी नहीं ,कभी नहीं।
एक प्रोमोशन ,साढ़े तेरह ट्रांसफर सुना ,देखा आपने कहीं
मैं तो झेल रहा हूँ वही , मैं तो भोग रहा हूँ वही।
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