अपनी डायरी से ( 2 2 फरवरी 2005 )
आज हबीब तनवीर जी का नाटक "चरणदास चोर " दयाल सिंह कॉलेज ,ऑडिटोरियम, नई दिल्ली में देखा। नाटक ने बहुत प्रभावित किया। चरण दास चोर बने गोविंद राम जी से भी बात किया। नाटक बहुत ही उत्कृस्ट था। अंत में हबीब तनवीर जी द्वारा दिया गया भाषण भी। कला ,साहित्य विरोध की पृस्ठभूमि तैयार करते हैं। विरोध एक दिन क्रांति बन जाता है। हर कलाकार ,साहित्यकार स्वभावतः प्रकृतिस्थ ,कुदरती तौर पर व्यवस्था विरोधी होता है। जो नहीं है,वह चाटुकार है। कला और साहित्य व्यवस्था पूजक या पोषक हो ही नहीं सकता। जँहा ऐसा हुआ ,वह समाज ,राज मृत हो जाता है। आज नहीं तो कल। हर सत्य का यही हस्र होता है ;जीवन में विरोध का सामना ,मरने पर आम लोगो द्वारा और विरोधियों द्वारा भी पूजा जाना। सिर्फ पूजा जाना ,आचरण नहीं। क्योंकि वह उनकी शक्ति के बाहर होता है। यह हस्र हुआ -सुकरात का ,ईशा मशीह का ,गाँधी का और चरण दास चोर का भी।
रामेश्वर दुबे
7 मई 2020 ( स्मृति 22 फरवरी 2005 )
आज हबीब तनवीर जी का नाटक "चरणदास चोर " दयाल सिंह कॉलेज ,ऑडिटोरियम, नई दिल्ली में देखा। नाटक ने बहुत प्रभावित किया। चरण दास चोर बने गोविंद राम जी से भी बात किया। नाटक बहुत ही उत्कृस्ट था। अंत में हबीब तनवीर जी द्वारा दिया गया भाषण भी। कला ,साहित्य विरोध की पृस्ठभूमि तैयार करते हैं। विरोध एक दिन क्रांति बन जाता है। हर कलाकार ,साहित्यकार स्वभावतः प्रकृतिस्थ ,कुदरती तौर पर व्यवस्था विरोधी होता है। जो नहीं है,वह चाटुकार है। कला और साहित्य व्यवस्था पूजक या पोषक हो ही नहीं सकता। जँहा ऐसा हुआ ,वह समाज ,राज मृत हो जाता है। आज नहीं तो कल। हर सत्य का यही हस्र होता है ;जीवन में विरोध का सामना ,मरने पर आम लोगो द्वारा और विरोधियों द्वारा भी पूजा जाना। सिर्फ पूजा जाना ,आचरण नहीं। क्योंकि वह उनकी शक्ति के बाहर होता है। यह हस्र हुआ -सुकरात का ,ईशा मशीह का ,गाँधी का और चरण दास चोर का भी।
रामेश्वर दुबे
7 मई 2020 ( स्मृति 22 फरवरी 2005 )
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