Saturday, July 27, 2019

श्रम से सृजन  सृजन से सेवा , सभी को मिले उत्पादकता मेवा
श्रम से जब उत्पादकता बढ़े , सेवा समृद्धि  , सदा  ऊपर चढ़े
सम्यक वितरण ख़ुशी गढ़े , सभी प्रेम की पुस्तक पढ़ें
शांति फैले  गुणवत्ता के ज्ञान से , प्रेम पनपे मानवता के मान से
श्रम , पूंजी , प्रबन्धन  से सबका हो कुशल क्षेम
उतपादकता , गुणवत्ता , मानवता , से सेवा , शांति , प्रेम 

Monday, October 14, 2013

EK PROMOTION SADHE TERAH TRANSFER-1

एक प्रोमोशन  साढ़े तेरह ट्रान्सफर 

एक प्रोमोशन  साढ़े तेरह ट्रान्सफर
सुना, देखा आपने कहीं
मैं तो झेल रहा हूँ वही
मैं तो भोग रहा हूँ वही।

बाईस बरस बीत गये, यह पुरानी बात है
बस एक  प्रोन्नति, साढ़े तेरह तबादला
जिसे मैं कहता हूँ दिन, वे कहते रात है,
अफसर हो ,सरकारी नौकर हो ,कवि हो ,
ब्राह्मण हो ,बनिया हो ,हरिजन हो,
हिन्दु हो,मुसलमान हो ,गिरिजन हो
वे रोज पूछते -क्या तुम्हारी जात है ,
और क्या तुम्हारी औकात है?
मौन ही रह करुण मन आक्रोश में कहता
आपके दिए पीड़ा, कष्ट
हमारी स्वतंत्रता के सौगात हैं ,
मै सबकुछ हूँ या कुछ भी नहीं।
एक प्रोमोशन  साढ़े तेरह ट्रान्सफर
सुना, देखा आपने कहीं
मैं तो झेल रहा हूँ वही
मैं तो भोग रहा हूँ वही।

पत्नी कहतीं -महामूर्ख हैं आप
अपने मन के राजा हैं ,
चोर ,चूहेडे  ,कुत्ते ,कम पढ भी
रोज बजाते आपके बाजा हैं
घर मे जितना मुझे बोल लीजिए
अपने मन की भङास खोल लीजिए ,
बाहर तो कुछ कर पाते नही
उनके आगे दाल गल पाते नही
अन्यथा बाईस बरस बीत गए
और एक भी प्रोमोशन हाथ आते नही,
उसके ऊपर साढ़े तेरह तबादला
अरे! डूब मरने को  चुल्लू   भर पानी है कही.
एक प्रोमोशन  साढ़े तेरह ट्रान्सफर
सुना, देखा आपने कहीं
मैं तो झेल रहा हूँ वही
मैं तो भोग रहा हूँ वही। 

मैं प्यारी पत्नी को समझाता 
देखें, जीवन मे कितना आनन्द है आता 
जब ह्रदय करुणित ,मन संतोषी 
फिर क्यों ढूँढे कहाँ, कौन है दोषी 
जो होने होते है वही होते हैं 
आज मै हँसता हूँ वे रोते हैं 
हम वही काटते हैं जो बोते हैं 
अहा! हम क्या पाते हैं, क्या खोते हैं 
फिर भी मेरे प्रतिबद्धता ,प्यार ,समर्पण 
में कोई कमी तो नहीं 
एक प्रोमोशन  साढ़े तेरह ट्रान्सफर
सुना, देखा आपने कहीं
मैं तो झेल रहा हूँ वही
मैं तो भोग रहा हूँ वही। 

Wednesday, August 17, 2011

इन्कलाब

पूर्वजों के आंसुओं से हुए
गीले गमछे अभी सूखे कहाँ हैं ? १
आजादी मिली आधी, अँधेरी रात में
इसीलिए तो दिखते नहीं भूखे कहाँ हैं ?
इंडिया की तरक्की से चकित लोग
भारत के नौजवान अभी उठे कहाँ हैं ? ३
गगनचुम्बी लहलहाती बिल्डिंगों में
खोजता है किसान उसके भुट्टे कहाँ हैं ? ४
स्वचालित मशीनों के दबाव में
मजदूरों के पसीने अभी छूटे कहाँ हैं ? ५
जमींन में गहरेगड़े हैं बीज आजादी के
उसकी कोंपले अभी फूटी कहाँ हैं ? ६
मन की बात हरदम मन के बाहर
मन के अंदर अभी घूटी कहां है ? ७
संसदीय गर्जना , कानूनी बिजली से
भ्रष्टाचारियों के रिश्ते अभी टूटे कहाँ हैं ? ८
हमारा इमानदार मुखिया रखता है मौन व्रत
खोजते रहो बेईमान, झूठे कहाँ हैं ? ९
सारी सियासत जहाँ की तहां धरी रह जाएगी
अरे ! हिन्दू मुसलमान अभी जुटे कहाँ हैं ? १०
स्वतंत्रता दिवस आते रहे हैं बार-बार, कईबार
असली इन्कलाब हमने अभी ढूंढे कहाँ हैं ? ११

Monday, March 22, 2010

GUNWATTA पचासा [UGUMA SATAK]

गुणवत्ता  पचासा 
सवास्थ्य, सौन्दर्य, आनंद आज नहीं है उपलब्ध, गुणवत्ता की मांग है
बिन मानवता उत्पादकता नहीं चाहिए ,नहीं चाहिए। १
नींद आती नहीं आज बिना गोली के, गूल की मांग है
बिना सुसुप्ति सयन नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । २
अजब का आकर्षण है इन आँखों में ,पर हृदय की मांग है
बिना करुना नयन नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । ३
प्रवाह में पूंजी के बह चले , बिक चले ,शास्त्र की मांग है
बिना सम दृष्टी निर्णय नहीं चाहिए ,नहीं चाहिए। ४
भ्रष्ट  है आचरण नर ,नारी , युवा की ,युग की मांग है
बिना प्यार प्रणय नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । ५
आज बच्चे दबे है बस्तों की  बोझ से , बचपन की मांग है
बिना स्वप्न सृष्टि  नहीं     चाहिए , नहीं चाहिए । ६
धर्मो , मतों , दलों में बटा   यह जगत , आम जन की मांग है
बिना दर्द दृष्टि नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । ७
चल रहा शोषण , कुपोषण विश्व के गाँव में , ऐश्वर्य की मांग है
बिना श्रम संपत्ति नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । ८
रूप , धन के आकर्षण से भरा यह संसार , सौन्दर्य की मांग है
बिना प्रेम दंपत्ति नहीं चाहिए , नहीं चाहिए ।
सत्य बाणी  का आभाव है आजकल , आनंद की मांग है
बिना प्यास पानी नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । १०
आज कवियों , लेखकों की भरमार पुरे संसार में , साहित्य की मांग है
शब्द बिना मानी नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । ११
अणु और अंतरिक्ष में लाख खोज करते रहें , जीव की मांग है
बिना अध्यात्म विज्ञान नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । १२
धर्म, इश्वर का ठेका लिए ठाट से घूमते रहे, दिन - दुखियों की मांग है
बिन भोजन -दवा ,आत्मज्ञान नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । १३
सत्ता ,संपत्ति के याचक भरे हैं मगर मानवता की मांग है
बिना कर्तव्य अधिकार नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । १४
बम , तोपों के जखीरे किये कायरों ने खड़े  , वीरता की मांग है
बिना साहस हथियार नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । १५
नदी ,नालों को बांध किये वारी बोतल में बंद ,सूखे बादलों की मांग है
बिना निति एकल व्यापार नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। १६
कहीं मौत अन्न के अभाव में ,कही सैर अन्तरिक्ष में , अहिंसा ,शांति की मांग है
बिना संतुलन संसार नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । १७
अहं  में तड़पते विद्वान गरजते , पर शिष्य की मांग है ,
विनय बिना विद्या नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । १८
आज श्रेष्ठ गुरुजन भी हैं ,भ्रष्ट टीचर भी हैं ,पर शिक्षा की मांग है
बिना आदर्श शिष्य और शिष्या नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। १९
रोग, गरीबी से रहा मर देश आज यह , स्वास्थ्य की मांग है
बिना भूख भोजन नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । २०
अन्याय से भरा यह जग औ धरा , न्याय की मांग है
बिना न्याय- युद्ध यौवन नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। २
सुख, सुविधाओं से सजे हैं पूंजिपत्तियों के घर ,निर्धन श्रमिकों की मांग है
बिना पूंजी वितरण उत्पादकता नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। २२
सिर्फ नारे औ हड़ताल से पूंजी बढती नहीं ,हर उद्यमी की मांग है
बिन उत्पादकता -बृद्धि  श्रम,शक्ति औ संगठन नहीं चाहिए,नहीं चाहिए। २३
विश्व तो गाँव हुआ नहीं पर गाँव बने विश्व की मांग है
बिन अन्न ,पानी ,हवा कंप्यूटर , मोबाइल नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। २४
अन्तरंग हुआ ध्वस्त ,बहिरंग दिखे मस्त  पर सेहत की मांग है
बिना चरित्र सुख, संपत्ति नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । २५
हो रहा रोज आविष्कार ,वैज्ञानिकों की भरमार पर विवेक की मांग है
बिना चरित्रवान ज्ञानवान नहीं चाहिए,नहीं चाहिए। २६
घरों में सजे दुकान कतारों में, अरबपति बढ़ रहे हजारों में,किसान ,मजदूरों की मांग है
बिना नैतिकता व्यापार नहीं चाहिए , नहीं चाहिए। २७
हबस को जगाओ मत ,नियम को सुलाओ मत ,समस्त जगत की मांग है
बिना आवश्यकता बाज़ार नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। २८
बढ़ते तकनोलोजी से जीव को कस्ट  ,पर्यावरण हो रहा नस्ट  ,हर जीव की मांग है
बिना मानवता विज्ञानं नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। २९
हो रहे पग पग पर खड़े ,मंदिर ,मस्जिद ,गिरिजघरें ,धर्म की मांग है
बिना त्याग ,विराग पूजा, अजान नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । ३०
पूँजीवाद,साम्यवाद जाती- रंग-वर्ग-धर्मवाद ,सब विवाद ही विवाद ,समाज की मांग है
बिना सत्य और सिंद्धांत राजनीती नहीं चाहिए ,नहीं चाहिए । ३१
मकान बड़े- बड़े ,परिवार छोटे-छोटे,दिल तो खोटे -खोटे , शांति की मांग है
बिना खाली समय सुबिधा, सामान नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। ३२
अब जितने विशेषज्ञों की भरमार ,बढ़ रही समस्याएँ उतनी अपरम्पार ,समाधान की मांग है
बिना सहकार प्रतिद्वंदिता नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । ३३
चाँद पर जाना अब सुलभ ,पडोसी का घर हो गया दुर्लभ ,मानवता की मांग है
बिना संवेदन, सरोकार विकाश नहीं चाहिए , नहीं चाहिए । ३४
टीवी, इन्टरनेट ,मोबाइल के दहाड़ ने किये खड़े सूचनाओं के पहाड़ ,पर निश्छल मन की मांग है
बिना सम्बन्ध बात , परिवार, समाज नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। ३५
खाते फास्ट फ़ूड ,पाचन शक्ति अवरुद्ध ,पर करते 'फील गुड', आज माट्टी की मांग है
बिना अपनी बोली,भाषा ,संस्कृति, 'विदेशी सरकार' नहीं चाहिए, चाहिए। ३६
कंपनियों के लाभ खूब बढ़ रहे, चंद लोगों के लोभ चढ़ रहे, छंटते मजदूरों की मांग है
बिना सम्यक लाभ वितरण औद्योगीकरण नहीं चाहिए, नहीं चाहिए।३७ 
आज लोग बढ़ रहे, मनुष्य घट रहे, मानवता की मांग है
बिना गुणवत्ता , उत्पादकता नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। ३८
अब घर नहीं,द्वार नहीं, सिर्फ मकान और दूकान है ,
नहीं अब दालान / , खिड़की ही खिड़की से होता आदान -प्रदान ,पडोसी की मांग है
बिना प्यार संवेदनहीन संसार नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। ३९ 
लोभ लाभों में पड़कर सभी है विक्षिप्त ,बिना मन पे अंकुश दिल कैसे हो तृप्त 
आज मानवता की मांग है ,बिना योग भोग नहीं चाहिए ,नहीं चाहिए ४० 
रक्तचाप, तनाव से भयभीत , निरोगता की मांग है
जल्दीबाजी से जर्जर, जटिल जीवन नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। 
महत्वाकंक्छा से सभी अतृप्त ,बिना मन पे अंकुश दिल कैसे हो तृप्त, मानवता की मांग है
बिना कर्म योग भोग नहीं चाहिए, नहीं चाहिए। 
चाहिए शांति ,सुख ,आनंद तो करे सभी को पसंद , उगुमा की मांग है
बिना योग, बोध, प्रेम लोग नहीं चाहिए , नहीं चाहिए। ४१ 
अब व्यापारियों/धनिकों  में एकता,मज़दूरों /गरीबो में फूट
इसी से संसार में मची है लूट ,
पर विश्व एकता की मांग  है  ,बिन सम्यक धन वितरण 
खुला व्यापार नहीं चाहिए ,नहीं चाहिए ४२ 
पूंजीवाद में सबकुछ बिकाऊ है,
साम्यवाद में कुछ नहीं टिकाऊ है ,
मानव वाद की मांग है मूल्यहीन,संवेदनहीन संसार नहीं चाहिए,नहीं चाहिए ४३ 
विज्ञापन का जोर है 
संत वही जो सबसे बड़ा चोर है 
समझदारी की मांग है 
बिना अनुभव -ज्ञान प्रवचन नहीं चाहिए ,नहीं चाहिए ४४ 
राजा को ईमान नहीं 
प्रजा को दिमाग नहीं,
प्रजातंत्र की मांग है 
बिना सत्य धारे ,लुभावन नारे नहीं चाहिए ,नहीं चाहिए ४५ 
विवेक का आदर नहीं ,बल का सदुपयोग नहीं 
विकाश की मांग है 
बिन आत्म निरीक्षण सर्व भक्षण नहीं चाहिए नहीं चाहिए ४६  
गायब है प्रकृति में सौंदर्य , और कार्य में आनंद 
मानवता की मांग है 
बिना आत्मीयता सम्बन्ध ,बिना रास जीवन नहीं चाहिए नहीं चाहिए,४७ 
शरीर में श्रम नहीं,मन में संयम नहीं ,अभिमान सुण्य अहं की मांग है 
बिना विवेक बुद्धी ,अनुरागहीन ह्रदय नहीं चाहिए नहीं चाहिए 48
आज व्यक्ति से ज्यादा वस्तु ,वस्तु से ज्यादा सिक्के  का है महत्व 
पर जीवन की मांग है बिना सत्य,प्रेम ,विवेक,तर्क नहीं चाहिए, नहीं चाहिए ४९ 
आवश्यकता की पूर्ति हो,,इच्छा की निवृति हो ,
मानवता की मांग है ,हम कुछ नहीं ,हमारा कुछ नहीं,
हमें कुछ नहीं चाहिए , नहीं चाहिए ५० 
[स्वास्थ्य ,सौंदर्य आज नहीं है उपलब्ध ,गुणवत्ता की मांग है ,
बिना मानवता उत्पादकता नहीं चाहिए नहीं चाहिए ]
 



  
















Monday, April 20, 2009

उत्पादकता चालीसा[ [UGUMA] SATAK

उगुमा चालीसा
दोहा-

उत्पादकता को नमन करूँ , गुणवत्ता को प्रणाम

मानवता समक्ष नत मस्तक , उगुमा हो अभिराम ।

उत्पादकता को कर में गहुँ , गुणवत्ता पुरे गात

मानवता को उर में धरूँ, उगुमा हो अंतरात्म
चौपाई -
जय उत्पादकता समृधि सागर
जय गुणवत्ता सौन्दर्य उजागर ।
जय मानवता आनंद प्रदायक
जय उगुमा सर्वस्व विधायक ॥ १

जय उत्पादकता श्रृष्टि कर्ता
जय गुणवत्ता वृद्धि कर्ता ।
जय मानवता सब दुःख हर्ता
जय उगुमा सबको संग रखता ॥ २

बढे उत्पादकता तो सेवा में वृद्धि
बढे गुणवत्ता तो शान्ति हो चहु दिशी
बढे मानवता तो प्रेम की सृष्टि
बढे उगुमा तो आनंद की वृष्टि ॥ ३


विन उत्पादकता मानवता नही होई
विन गुणवत्ता उत्पादकता-अर्थ न कोई ।
विन मानवता उत्पादकता बेकार
तभी तो जग में मची हाहाकार ॥ ४

उत्पादकता - सृष्टि से सब कोई सरसे
गुणवत्ता - गुण से सब कोई हरसे ।
मानवता - प्रेम तो सब पर बरसे
उगुमा परस हेतु देवता भी तरसे ॥ ५

हाय , मानवता के गोदाम पे डाला
उत्पादकता का बड़ा सा ताला ।
गुणवता ही है कुंजी , लाला
उगुमा पट खोलो , करो निवाला ॥ ६

उत्पादकता वसुंधरा है भाई
गुणवत्ता शांत शशि की नाई ।
मानवता दिनकर सी प्रभा विखराई
उगुमा निखिल ब्रह्माण्ड गुसाईं ॥ ७

उत्पादकता सुख सबको सुहाई
गुणवत्ता सबके मन भाई ।
मानवता के सब देवे दुहाई
जब उगुमा जन मन में समाई ॥ ८

उत्पादकता धन सृजनहार
गुणवत्ता से निःसृत विकार ।
मानवता दीन पालनहार
उगुमा रचे सम्यक संसार ॥ ९

उत्पादकता सब जीवों का त्रान
गुणवता है सबका ही प्राण ।
मानवता से हो कल्याण
उगुमा से अपवर्ग प्रयांन ॥ १०

उत्पादकता मन के बाहर खोज
गुणवत्ता है मन का सोच ।
मानवता है अंतरतम परितोष
उगुमा सम्यक संतुलित होश ॥ ११

उत्पादकता सरजे ब्रम्हा की नाई
गुणवत्ता पाले विष्णु सम भाई ।
मानवता करे शिव सा मंगल
जब उगुमा हो ,जग में ना दंगल ॥ १२

उत्पादकता ब्रम्हचर्य आश्रम
गुणवत्ता गृहस्थ सा श्रम ।
मानवता वानप्रस्थ सा सेवा
उगुमा सन्यास -आनंद मेवा ॥ १३

उत्पादकता से शुद्र सेवा मूल
गुणवत्ता से खिले वैश्य -गुल ।
मानवता छत्रिय सदृशा
उगुमा ब्रह्मण संत सरीखा ॥ १४

उत्पादकता -समय, उर्जा ,सामान बचाए
गुणवता - जो जब मांगे सो सब पाए ।
मानवता दो हृदय मिलाये
उगुमा सर्वत्र अनीति मिटाए ॥ १५

अब कोई व्यर्थ न समय गवाए
उगुमा के आगे शीश झुकाए ।
करे अमल निज, परिवार ,देश
सर्वश्वा प्राप्त हो न रहे कुछ शेष ॥ १६

जय उत्पादकता सेहत दाता
जय गुणवत्ता स्वाद प्रदाता ।
जय मानवता आरोग्य विधाता
जय उगुमा सब जन के त्राता ॥

जो यह पढ़े उगुमा चालीसा
हो शांत सुखी निर्भय बाली -सा ।
जब सब जन उगुमा को ध्यावें
समता, ममता, सुख, सम्पति पावें ॥ १८

उत्पादकता सुख ,संपत्ति का खेल
गुणवत्ता सुख- शांति का मेल ।
जीवन बाती ,मानवता तेल
बिन उगुमा यह जीवन जेल ॥ १९

मिल श्रमिक उत्पादकता बढ़ाएं
सबके मन गुणवत्ता भाये ।
पूंजी वितरण मानवता लाये
उगुमा दर्शन सबको सुहाए ॥ २०

उत्पादकता सत से असत की राह
गुणवत्ता तम से ज्योति की चाह ।
मानवता मृत्यु से अमरता पान
उगुमा दे यह अभय वरदान ॥ २१

उत्पादकता हो कर्त्तव्य हमारा
गुणवत्ता हो पहचान हमारा ।
मानवता हो लक्ष्य हमारा
उगुमा का यह दर्शन न्यारा ॥ २२

जब तक हम जियें , आनंद से जियें
उरिन होकर अमृत हम अमृत पियें ।
उगुमा- रस देह में भीने दें
खुद जियें औरो को भी जीने दें ॥ २३

मत मौज करो दूसरो को मार
बंद करो यह घटिया व्यापार ।
खुद मरकर पर को मत मारो
उगुमा सन्देश से जगत उबारो ॥ २४

जो उत्पादकता- पथ निज आचरहिं
गुणवता मन में जो धरहीं ।
मानवता जो सदा अनुसरहीं
जग में सदा सर्व सुख करहिं ॥ २५

यह चालीसा नित पढ़े जब कोई
सुखी, शांत, आनंद मगन होई ।
जो यह करे ,पढ़े, सुने, सुनाये
पीर , कलह , कष्ट तुरत मिट जाये ॥ २६

उगुमा सबका प्राण उबारे
सुख, शांति, व सेहत वारे ।
सबका सर्वत्र कष्ट निवारे
जय उगुमा तू सबको तारे ॥ २७

उत्पादकता- अधिकतम देना
न्युनत्तम लेना श्रेष्ठतम जीना ।
गुणवत्ता - शांति- रस पीना
मानवता - प्रेम -रस भीना ॥ २८

उत्पादकता जन मन में समाये
गुणवत्ता जब सबको भाये ।
मानवता सबको हरसाए
उगुमा सबका द्वंद्व मिटाए ॥ २९

उत्पादकता मूल संस्था आधार
गुणवत्ता मध्य तना ,पत्ती डार
मानवता उच्च फूल,फल चार
उगुमा सम्पूर्ण जगदाधार ॥ ३०

उत्पादकता हो गरीबी निवारक
गुणवत्ता हो शांति धारक ।
मानवता हो करुना करक
उगुमा हो सब दुःख संघारक ॥ ३१

उत्पादकता श्रमिक के हाथ
गुणवत्ता प्रायोजक के साथ ।
मानवता उच्च प्रबंधन-माथ
उगुमा प्राण संस्था रूपी गात ॥ ३२

मानवता सहयोग बढ़ावे
उत्पादकता बर्बादी घतावे ।
गुणवत्ता चार चाँद लगावे
उगुमा समता ,ममता लावे ॥ ३३

सहयोगिता ही जीवन आधार
प्रतियोगिता से बढ़े अत्याचार ।
निर्बल गरीबों पर चौगुना मार
कुदरत भी होती लाचार ॥ ३४

उगुमा सन्देश सीमित हो इक्छा
समता ,करुना ,प्रेम की शिक्छा ।
सम्यक वृद्धि , ना हो हिंसा
सहयोग, स्नेह हो बढ़े अहिंसा ॥ ३५

उत्पादकता गुणवत्ता से बढ़े व्यापार
मानवता से सहयोग ,प्रेम का हो संचार ।
जो मन में लाये उगुमा का विचार
हो जाये उन सबका वेना पार ॥ ३६

उगुमा विचार है एक क्रांति भाई
निज,घर-परिवार का हो भलाई ।
संता का, देश का करे विकाश
अज्ञान मिटे चंहु दिशी हो प्रकाश ॥ ३७

बिन उत्पादकता दुखमय जीवन
बिन गुणवत्ता न चैन अमन ।
बिन मानवता जीवन मे ना रस
बिन उगुमा बेकार है सर्बश ॥ ३८

जब नित गायें उगुमा चालीसा
और ध्यान नित उगुमा पर आशा ।
मिटे जग का सारा खेल तमाशा
मिटे सबका दुःख दर्द हताशा ॥ ३९

उगुमा का सन्देश सुने बहन औ भाई
लिंग, धर्म, वर्ग, भाषा,क्षेत्र की नहीं लराई ।
दीनता,हीनता मिटे कर ,में गहुँ
उगुमा घन जब नभ चंहु दिशी छाई ॥ ४०

दोहा -
उत्पादकता से भोजन मिले ,गुणवत्ता से स्वाद
मानवता से मिले प्रेम-रस ,उगुमा से मिटे प्रमाद ।















































Sunday, March 8, 2009

उत्पादकता की उत्तम परिभाषा

न्यूनतम लेना , अधिकतम देना और श्रेष्ठतम जीना - यही उत्पादकता की उत्तम परिभाषा है । यही जीवन की सर्वोच्च विद्या है। यही जीवन में गुणवत्ता लाता है । यही जीवन को सुगंध से सुवासित एवं सौन्दर्य से विभूषित करता है। यही मानवता का आधार है ।

Sunday, July 20, 2008

RAMESHWAR DUBEY-DETAILS

SHRI RAMESHWAR DUBEY, Ex DIRECTOR
NATIONAL PRODUCTIVITY COUNCIL,(MoC&I)LODI ROAD, NEW DELHI 
C-57,PARIVAHAN APT.SEC.-5, VASUNDHARA,GHAZIABAD (UP)-201012 Ph.0120-4109192(Res.) (M) email:rdubey2016@gmail.com
QUALIFICATION : Graduate (Mech.Engg.) Rourkela; Post Graduate (Indl. Engg.) Chennai; Post Graduate (HRM) New Delhi; Post Graduate Certificate (HRD Audit) Ahamadabad; Training (PROMIS) Tokyo; Training (QCD) Singapore; Training (DPS:AP) Kuala Lampur;
Training (TPS e-Learning ) Tokyo(APO); 6- Sigma(Green Belt) Tokyo (APO)
EXPERIENCE :
Shri Dubey has handled various projects as a mechanical engineer & resident engineer for a couple of years in private companies. Shri Dubey joined National Productivity Council in 1985. He has spent more than three decades in various departments & offices of NPC located through out the country. Worked as Assistant Director (Industrial Engg.) in Patna RD, till 1992, worked as Dy. Director In charge of TUWP (HRD Div) of NPC HQ at national level.till 2004, worked as Sr.Dy.Director (PM,IE ) of NPC HQ till 2009 as Head (IE,HRD) at Hyderabad RDtill2013 As Director & Head at Kanpur RD till2019.  He has worked as advisor & consultant-cum-trainer for various consultancy/development projects in the field of Industrial Engg. Man Power Planning & Rationalisation, Restructuring, Attitudinal change,O.D.Incentive Scheme, Improving System, Work Culture(PQH model)Training Technology, HRD intervention for Productivity & Quality Culture, Participative Management, IR & HR, QC,TQM, ISO-9000 etc. He has contributed papers & organized various seminars, symposiums, workshops at national & international level in the field of HRD, IE & Management.
CLIENTLE :
Ministries & Deptts. of Central, State & Local Govt., CPSUs, SPSUs, e.g. ONGC, GAIL, NTPC, BEL,IOC, HPCL, DTC,NIPCCD,ALIMCO,CEL,APAIL,CWC,NMDC,RINL,                                                CIL,NALCO,CMPF,EPFO,DOE,DPE,SJVN,THDC,NPC,NSC,DTC,MCD,NOIDA,Private Sectors like Moser baer, Reliance, Tatas, Thapars, Birlas, Modis, Triveni, Goenkas, Shrirams, Dalmias, Indorama, Indal,Thompson Press,DCM Shriram etc
UNIVERSITIES/INSTITUTIONS: IIM Kashipur, IIT Delhi,HBTU Kanpur,MMTU Gorakhpur, RMLU Faizabad, RGITM Bareli, GHSIM&R Kanpur
PUBLICATIONS:
Shri Dubey has written a book “LABOUR & MANAGEMENT ALONGWITH PRODUCTIVITY- UTPADAKTA KE SANG SHRAMIK AUR PRABANDH "in Hindi released by Hon’ble President of India Dr. Shankar Dayal Sharma in the Rashtrapati Bhawan on 26th April, 1995. A drama “DO HATH” on above was staged in Delhi. This has been telecast many times by SITI cable/ZEE TV. He has authored the 2nd book in series “LABOUR & MANAGEMENT ALONGWITH QUALITY-GUNWATTA KE SANG SHRAMIK AUR PRABANDH” released by Hon’ble Minister of Labour, Govt. of India, Dr. Satya Narayan Jatia on 25th Oct. 1998. "SAF SAFAI AOM RAKH RAKHAV SE UTPADAKTA, GUNWATTA,MANAWATA(PRODUCTIVITY, QUALITY, HUMANITY THROUGH HOUSE KEEPING, 7-Ps) "book in Hindi published in 2003 by HMS & sponsored by ILO. Composed
UTPADAKTA CHALISA,GUNWATTA PACHASA  MANAVTA DASA(UGUMA SATAK)  in 2012
and LABOUR AND MANAGEMENT ALONGWITH HUMANITY in Hindi in 2016
All India Radio has broadcast interview of Shri Dubey & also Doordarshan has talecast his interviews  discussion and poetry recitation. Various papers, articles, stories and poetry on Productivity, Quality, Labour, Human & Industrial relations have been published in leading national news papers, magazines & other professional journals like Economic Times, Financial Express, Business World, Front Line, Productivity, Manpower Journal, Excellence in Supervision and various others. Shri Dubey has unique literary taste along with engineering skills. His collection of poetry in Hindi "HUM NAHI JANTE  was released by the Hon’ble Speaker of Lok Sabha Shri P.A.Sangama on 13th July, 1996. Collection of Poetry “APKA HAI KYA- published in 2001 “WOH KAHATI RAHI-, Novel in Hindi published in 1999. “AANKHIN DEKHI a Hindi story book published in 2004.
Because of the above creative contribution in the field of Productivity, Quality, Humanity, Social & Human Relations Shri Dubey’s brief has been included in “WHO’S WHO OF INDIAN WRITERS” by Sahitya Academy, Govt. of India. The above books on Productivity & Quality have been highly appreciated and distributed among all Centres of CBWE, Ministry of Labour, Govt. of India at national level. The above first two books have been included in the list of standard books by Deptt. of Official Languages, Govt. of India.