Friday, May 23, 2025

मेरे साथी -मेरा बचपन (MY FRIENDS-MY CHILDHOOD)

                                          मेरे साथी -मेरा बचपन  

मेरे साथी ,मेरे साथी 

हम वैसे ही रहते जैसे 

झुण्ड में रहते हाथी। 

संकट में हम हाथ बटाते 

नाचते गाते शोर मचाते 

बस में सब साथ ही जाते 

अंधों  को रोड पार कराते 

जहाँ दीखता प्लास्टिक कूड़ा 

हम मिल सब उसे हटाते।

धरती माँ को रोज सजाते

पौधों को पानी से  रोज पटाते।

नहीं तोड़ते फूल ,पत्ते, टहनी और डाली 

मदद करते जिसकी अच्छी नहीं मालत हाली 

बिल्लू ,पिल्लू को घर में हमने पाली। 

उनके संग खेलते,कूदते,,हसते ,गाते,

वाह!बचपन में क्या आनंद है पाते।

पुष्प,पशु,पक्षी पादप,तितली,दोस्त  के साथ। 

अहा! क्या भोला बालपन व् अद्भुत विश्वास। 


20 अप्रैल 2025 ,वसुंधरा,गाज़ियाबाद 















Saturday, May 17, 2025

होली रे

 होली रे 

पूरे बरस मै  परस को तरसा ,तू ना कुछ बोली बोली रे 

मधु मौसम मन हरसा हरसा ,बिन बोले मेरी हो ली रे, हो ली रे। 1 

चाहे बम मारो या भाला बरछा ,या बन्दूक से गोली रे 

फागुन की बलिहारी जाऊँ ,बिन पूछे तेरी हो ली रे ,हो ली रे।2 

गली गावं में चर्चा ,चर्चा आज ही भीगी अंगिया चोली रे 

मौन मौन ही रटत ये रसना ,आज साजन की हो ली रे ,हो ली रे। 3 

बिरह में तड़पत उमर  सब बिता ,अब उठी फागुन में डोली रे 

पीया घर हंसी, पीहर सब रोअत ,किसकी थी किसकी हो ली रे हो ली रे।4 

मोर,काग,पीक कुहुकत, कुहुकत,रखो न मेरी खाली खोली रे 

मधुमास मन तड़पत तड़पत ,भर दो भर दो ,आज तेरी हो ली रे हो ली रे। 5 

नाला, नदिया,गोरिया ,संवरिया,पेड़ पत्ता सब डोली रे 

भंवरा फूल डोलत बगिया,बगिया  

आज प्रेम बीज बो ली रे ,बो ली रे

आज बस तेरी हो ली रे ,हो ली रे। 6 

कैसे गाऊं बिरह का गाना ,बिन मिले साजन आज मत जाना 

भर दे, भर दे खाली झोली रे,

आज तो तेरी हो ली रे हो ली रे।7 

मैं तो रूठी घर से निकली ,सब कहें बौरी पगली, पगली

भई बिबस जब झांझ मजीरा लिए आई सखियन की टोली रे 

ये बौरी अब तेरी हो ली रे हो ली रे।8 

सिर्फ दोष नहीं मेरा अपना ,तुमने ही मुझे छेड़ा सजना

कि  बिरही बन फागुन में रहना  

पर अब तक तेरी पोल न खोली रे 

आज तो तेरी हो ली रे ,हो ली रे। 9 

जनम जनम की लगी जो करिखा ,रगड़ रगड़ तूने तत मेरा परिखा ,

लागि जो दगिया कटु तेरी बतिया रतिया धो ली रे ,धो ली रे 

आज साजन तेरी हो ली रे हो ली रे। 10 

मार्च 2006 झाँसी   

  

   

  

 











 




प्रेम गीत

 प्रेम गीत 

जब से आपका नेह मिला ,मौसम भी अमृत बरसाने लगा है 

उपाधि की आश गयी क्या ? और भी आनंद आने लगा है 

चमन को कैसे बचाएं उल्लुओं ,गिद्धों के राज में 

यही एक चिंता तोता,मैना,कोयलों ,भौंरो को सताने लगा है। 

डाल, पत्ती की  बात क्या , आकाश में भी है इनकी पहुँच 

हर परिंदा डर-डर कर अपना पंख फड़फड़ाने लगा है। 

जबसे आपके दर्शन हुए दुर्लभ ,ह्रदय और भी प्रेमगीत गाने लगा है। 

सब जगह बस आप ही आप,अब तो पतझड़ में भी बसंत आने लगा है। 

जब से नियति के नियम होने लगे भंग ,सेर को गीदड़ भी डराने लगा है। 

शहर में सहर होती ही कब ,जबसे बिजली जगमगाने लगा है ?

जब से आपके नयन के नीर ने छुए हमारे बदन ,

चाँद का ठंढापन भी हमारे हृदय को गरमाने लगा है। ,

पांव भी थिरकने को बेताब ,जब से आपका गांव करीब नजर आने लगा है। 

मार्च 2006 









 



उनके गुमान

 उनके गुमान 

हुजूर हमारी गली से बिन बताये 

खामोश गुजर जाते हैं 

कमाल है,पता नहीं 

कैसे हम जान जाते हैं? 1 

दरिया की गहराई में एकांत 

 वे  मधुर तान भरते हैं 

सतह पर स्वर भला 

कैसे हम पहचान जाते हैं ?  2 

जिनके आने की आहट से 

दिल में उठती थी मोहक हिलोरें 

उनके अहसास अब 

क्यों मन में तूफान लाते हैं ? 3 

जब हम थे अजनवी 

रोज लाते थे वे प्यार के सन्देश 

अब उनकी याद, क्यों 

मौत का फरमान लाते हैं? 4 

जिनकी धड़कनो से चलती थी 

कभी अपनी एक एक सांसे 

पता नहीं क्यों अब वे नहीं 

उनके अरमान आते हैं ? 5 

किसे कहते हैं प्यार,जज्बात,मुहब्बत 

अभी देखना है बाकी 

कि वे खुद आते हैं 

या उनके अरमान आते हैं?  6

दिसंबर 2005 


















विधान

 विधान 

देश,राष्ट्र ,अनुशासन एवं संविधान के नाम पर 

धर्म,जाति ,मजहब,रंग,नस्ल,भगवान् के नाम पर 

बनाते है मनुष्य को बहरा और गूंगा 

अपाहिज,अंधा,लंगड़ा,और लूला 

और फिर देते हैं दया बस टुकड़ो में  दान 

या भीख में पद,पैसा,प्रभुत्व,ईनाम और सम्मान 

चाहते हैं सभी करें इस परम्परा का पालन 

जो करते मानने से इन्कार 

कर दिया जाता उन्हें जाति धर्म से  वहिष्कार 

दिया जाता यातना, जेल,पुलिस,लाठी ,गोली,मुठभेड़ 

ओह रे!चौपट राजा ,और नगरी  अंधेर।

जून 2015 

फर्क पड़ता है

 क्या फर्क पड़ता है 

कहाँ पहुंचे  ,कितना चले ?

फर्क पड़ता है 

कैसे चले, किस पथ पे चले ?

क्या फर्क पड़ता है 

कितना पढ़े,और कितना गढे ?

कितना बढ़े और कितना चढ़े ?

फर्क पड़ता है 

क्या पढ़े और क्या गढ़े ?

कैसे बढ़े और   कैसे चढ़े ?

क्या क्या खाये और कितना खाये 

से क्या फर्क  पड़ता है ?

फर्क पड़ता है कि 

किसका खाये और कैसे खाये ?

क्या फर्क पड़ता है 

कहाँ सोये, कितना सोये ?

कहाँ रोये, कितना रोये ?

फर्क पड़ता है कि 

जहाँ भी सोये कैसे सोये ?

जहाँ भी रोये कैसे रोये?

कब रोये और कब सोये?

सोचिये अभी तक 

क्या पाए और क्या खोए ?

क्या काटे और क्या बोये?

मई 20015 
























Friday, May 9, 2025

पत्थरऔर देव

पत्थर  को भी जब पहनाते   ताज 

होते वे पूज्य ,सिंहासन पर विराजमान 

पण्डे,पुरोहित ,नगाड़े ,ढोल,झाल 

पैसो की बरसात, भक्तो का धमाल 

मिलाने का समय तय 

शांति की जगह हिंसा और भय ही भय 

सोने चांदी के चौखट किवाड़ 

जो पहनाया ताज 

वह देख रहा 

आस्था श्रद्धा  भक्ति प्रेम विश्वास 

का मायावी खिलवाड़