Saturday, May 17, 2025

विधान

 विधान 

देश,राष्ट्र ,अनुशासन एवं संविधान के नाम पर 

धर्म,जाति ,मजहब,रंग,नस्ल,भगवान् के नाम पर 

बनाते है मनुष्य को बहरा और गूंगा 

अपाहिज,अंधा,लंगड़ा,और लूला 

और फिर देते हैं दया बस टुकड़ो में  दान 

या भीख में पद,पैसा,प्रभुत्व,ईनाम और सम्मान 

चाहते हैं सभी करें इस परम्परा का पालन 

जो करते मानने से इन्कार 

कर दिया जाता उन्हें जाति धर्म से  वहिष्कार 

दिया जाता यातना, जेल,पुलिस,लाठी ,गोली,मुठभेड़ 

ओह रे!चौपट राजा ,और नगरी  अंधेर।

जून 2015 

फर्क पड़ता है

 क्या फर्क पड़ता है 

कहाँ पहुंचे  ,कितना चले ?

फर्क पड़ता है 

कैसे चले, किस पथ पे चले ?

क्या फर्क पड़ता है 

कितना पढ़े,और कितना गढे ?

कितना बढ़े और कितना चढ़े ?

फर्क पड़ता है 

क्या पढ़े और क्या गढ़े ?

कैसे बढ़े और   कैसे चढ़े ?

क्या क्या खाये और कितना खाये 

से क्या फर्क  पड़ता है ?

फर्क पड़ता है कि 

किसका खाये और कैसे खाये ?

क्या फर्क पड़ता है 

कहाँ सोये, कितना सोये ?

कहाँ रोये, कितना रोये ?

फर्क पड़ता है कि 

जहाँ भी सोये कैसे सोये ?

जहाँ भी रोये कैसे रोये?

कब रोये और कब सोये?

सोचिये अभी तक 

क्या पाए और क्या खोए ?

क्या काटे और क्या बोये?

मई 20015 
























Friday, May 9, 2025

पत्थरऔर देव

पत्थर  को भी जब पहनाते   ताज 

होते वे पूज्य ,सिंहासन पर विराजमान 

पण्डे,पुरोहित ,नगाड़े ,ढोल,झाल 

पैसो की बरसात, भक्तो का धमाल 

मिलाने का समय तय 

शांति की जगह हिंसा और भय ही भय 

सोने चांदी के चौखट किवाड़ 

जो पहनाया ताज 

वह देख रहा 

आस्था श्रद्धा  भक्ति प्रेम विश्वास 

का मायावी खिलवाड़ 

घर और बाजार

 पहले घर था मकान नहीं इसलिए उसकी कोई कीमत नहीं

पहले था हमारा  घर सड़क से  दूर 

शांत , शुद्ध खुशहाली से भरपूर

आज मेरे मकान  का लौह दरवाजा सीधे सड़क पर खुलता है

शोरगुल के बिच हर  कोईआने वाला कुत्तेऔर दरवान  से जुझता है 

कीमतआसमान छू रहा 

मुंह मांगा दम मिल रहा

 कोई दिक्कत नहीं 

कोई दिक्कत नहीं 

पहले हम घर से निकल बाहर बाजार जाते थे 

दो पैसे में दादी का चिमटा और गुड़ की मिठाई लाते थे 

आज पहुंच गया है बाजार हमारे घर में 

छाती पर चढ़ छीन रहा जो भी है कर में 

बाजार में घर ,घर में बाजार 

बिन घर जारे स्वर्ग मिले कबीरा भया लाचार 

किसी की हिम्मत नहीं 

जो पहले  बाजार के समय और स्थान को बदल सकता था 

बाजार रामघाट पर हप्ते में शाम को एक दिन लगता था 

आज घर में ही चौबीसो घंटे बाजार लगता है 

जहाँ प्लास्टिक का सदाबहार फूल खूब फबता है 

बाजार का कमाल कि 

बरसात में बसंत और ग्रीष्म में हेमंत 

कोयल की टीबियाई  कूक और पसीने का अंत 

कोई इज्जत नहीं 

पहले पानी हवा भोजन अतिथि को नहीं थे बिकाऊ 

शरीर क्या आज आत्मा ,चरित्र,आस्था,धर्म,ईश्वर 

रिश्ते नाते कुछ भी नहीं टिकाऊ 

सब बाजार में कार की मॉडल की तरह बदल रहे  

फिर भी लैला मजनू रोमिओ जूलियट सावित्री सत्यवान 

की सीरियल कहानी में मगन रहे 

जीवन से जो जितना दूर 

लगता उतना परिपूर्ण 

क्या पहले भी था 

या सिर्फ आज ही ?












आज का बाजार

 वसुधेव कुटुम्बकम मत कहो,कहो विश्व व्यापार

यू एनओ को मारो लात करो वियतनाम,अफगान,इराक पर वार

  श्वास लो  धुआ पियो कोक ,पेप्सी बीयर बार

करो विचारों इतिहासों का अंत 

सभ्यताओं पर निरंतर वार

पढ़ो बाजार, पढ़ाओ बाजार, बढ़ो  बाजार, बढ़ाओ  बाजार

जय   हो, जय हो, जय हो,बाजार ,जय हो बाजार 

प्रजातंत्र मानवता को बचातेअणुबम,नारे,तलवार

झूठ,फरेब,लोभ ,भय ,सेक्स विज्ञापनों  की भरमार

अपराधी ,हत्यारे खुलेआम घूमे संत सभी बंद कारागार

हाथ में लैपटॉप कान में सेल फोन चमचमाती मोटर कार

चमड़ा मोटा दिमाग छोटा हृदयहुआ  छलनीऔर तारतार 

धन्य हो बाजार,धन्य हो बाजार,धन्य हो बाजार

अब मंदिर, न मस्जिद न गिरिजा, न गुरुद्वार 

न जैन, न पारसी ,न यहूदी, न बौद्ध बिहार 

न पंडित, न मुल्ला, न पादरी, न जत्थेदार 

न भाई बहन, न माई बाप ,न दोस्त यार 

सारे रिश्ते नातो  में पसर गया बाजार 

भाड़े के पति पत्नी ही भरा पूरा परिवार 

अब रहा गाँव न पड़ोस न घर न द्वार 

उदय हो बाजार,सुहृदय हो बाजार,अभ्युदय हो बाजार 

सड़क बनाते सतनु मर गए घड़ा बनाते घुरा कुम्हार

मॉल में दब गए दुधन  ददू , जूता बनाते चतुरी चमार 

मुसहर टोली, मनाई होली पकड़े जब आतंकी चूहे चार 

प्लास्टिक खा के गाय मर गयी, कूड़ा बीनते कनुआ कहार 

पेस्टिसाइड पीके रेड्डी राणा मर गए ,मछली पकड़ते पुथ्रन  पेरियार 

भारत भवानी की भ्रूण में हत्या ,पार्लियामेंट में जुत्तम पैजार 

पस्त हो बाजार, त्रस्त हो बाजार, ग्रस्त हो बाजार

पापा को मिला जबरन वीआरएस 

चाचा  की फैक्ट्री बंद आज का समाचार

दादी मेरी खाट पड़ी बाबा बूढ़े बेहद बीमार 

बहन बिकी बाज़ार में जवान बेटा बेरोजगार 

मनुआ मरा दवा बिना मुनिया मरी बिन आहार

हय  हो बाजार ,छय  हो बाजार,लय  हो बाजार

जंगल की आग  की तरह पछेया हवा में बढ़ रहा बाज़ार 

गाय, भेड़, बकरी, खरगोश 

तीसरी दुनिया के सब जानवर लाचार 

पुरे जंगल में बचा एक सेर रहा दहाड़ 

पुरवइया बयार की है सबको इन्तजार 

ध्वस्त हो बाजार , नष्ट हो बाजार , विनष्ट हो बाजार 















 












पानी

 पढ़ा है विज्ञान में

पानी का घनत्व तेल से ज्यादा होता है

लगता कुछ और पर कुछ और होता है 

इसीलिए तेल पानी पर छा जाता है 

पानी के ऊपर ऊपर  ही बहता है 

तो क्या विज्ञान के इसी नियम के तहत 

पुरानी-पानीदार सभ्यता पर छा गया  तत्काली तेली सभ्यता

विज्ञान का अटल नियम है 

तेल पानी मिलेगा 

तो पानी पर तेल बहेगा 

वर्षों से मैं चिल्लाता रहा 

जोर  शोर से बड़बड़ाता रहा

पानी तेल मत मिलाओ 

न पूरब पश्चिम एक कराओ

पूरब अपना पानी  राखो

पश्चिम में व्यर्थ मत बहाओ







चुल्लू भर पानी

हमारे पास नहीं है ,चुल्लू भर भी पानी

आज ही नहीं सदियों से

हम सिर्फ कोक, पेप्सी, बियर, बोतल पीते हैं

मैकडॉनल्ड, बर्गर,पिज़्ज़ा,चॉकलेटसे ही जीते हैं

इसीलिए हमारी चमड़ी सफेद, दिल काले और खून ठंडे  हो गए हैं

हम में नहीं बची करुणा, शर्म, हया, लाज ,सम्मान (एक भी मानवीय गुण)

नहीं तो मर नहीं जाते चुल्लू भर पानी में!

मासूम बच्चों पर बम गिराने से पहले

गर्भवती माओ पर मशीन गन चलाने के पहले

निहथ्था  कर फिर मिसाइल चलाने से पहले

लाश  पर महाशक्ति विश्व विजेता के बूट बढ़ाने से पहले

लेकिन मरे कहां ?पानी चुल्लू भर भी नहीं

सिर्फ कोक,पेप्सी,बियर- तंत्र

वह भी बोतल बंद

लेकिन शेष दुनिया वालों

तुम्हारे त्वचा तो काले, पीले, श्याम, हृदय लाल एवं खून गर्म थे

तुम तो करुणा, सत्य, समता, शांति के पुजारी

मेसोपोटामिया,बेबीलोन, हड़प्पा,मोहनजोदड़ो,

बौद्ध, तिब्बती,पूर्वी सभ्यता के स्वाभिमानी

अहिंसा, सत्य ही तुम्हारे धर्म थे

तुम्हारे यहाँ तो पानी के जलाशय  ही जलाशय हैं

गंगा, कावेरी,नर्मदा ,सिंधु, दजला, फरात, ह्वांग हो नील 

नदियां, तालाब, पोखर, झरने और झील

तुम सब ये देखने से पहले क्यों नहीं मर गए

ये दिन भी देखने के लिए क्यों रह गए

या देखने के बादआघात से या डर सेअब क्यों नहीं मर जाते

नहीं, नहीं  मर सकते 

क्योंकि तुम्हें भी लग गई है लत 

और शुरू कर दिया है अरसों से  पीना,पेप्सी कोक और बियर

तभी तो मेरे साथ रहे रत 

उसे नंगा, निहत्था करने कराने में माय डियर

और जब वह निहत्था ही नहीं कंगाल हो गया

कुछ भी न बचा नर कंकाल हो गया

चुल्लू भर पानी को तरसने लगा तो हमने भी  दिखा दी अपनी बहादुरी

और उसे कर दिया धराशाई

अब हमें तुम बर्बर,आतताई , गुंडा या शैतान कुछ भी कह लो

अब इन्हें ही शर्म आएंगी 

यह संज्ञाएँ ही  लजायेंगी 

चुनौती है विश्व के सभी साहित्यकारों, कवियों, लेखको ,समाज एवं मनोवैज्ञानिकों को

खोजें, नोबेल पाएंऔर करें मेरा नया नामकरण 

तब तक लिपटे रहने दो मेरे ऊपर प्रजातंत्र मानवता का आवरण

अगर खुरचोगे तो मानवता ,प्रजातंत्र के हत्यारों 

फिर दूसरी गलती के अपराध में तुम्हारा भी वही हश्र होगा

निहत्थे नंगे करने के पहले हीअब तो पतलशायी  कर दिए जाओगे

क्योंकि पहली गलती तुमने पहले ही कर दिया

मेरे दुश्मन बन गए जो खुल के मेरा साथ नहीं दिया

इसलिए दुनिया वालों सावधान,अभी भी बहुत पानी है

चुल्लू भर पानी न मांगना पड़े उधार  या कर्ज 

 मरने के लिए

अतः खुद मर जाओ

या कोक, पेप्सी ,बियर ही पीयेंगे का नारा लगाओ 

आया तुम्हारी समझ में नेताओं, दुनिया के रहनुमाओं

क्यों नहीं है हमारे पास यह मुहावरा कि 

चुल्लू भर पानी में मर जाओ


20 अप्रैल 2003,लोधी गार्डन ,नयी दिल्ली