Wednesday, May 28, 2025

सिन्दूर

         सिन्दूर   

रगों में दौड़ते रहने के हम नहीं कायल ,

जो आँखों से न टपके वो लहू क्या है ?   ग़ालिब  

अब तो मांग में भी भरे जाने के नहीं  लायक  ,

जो रगों में दौड़कर लहू को ठंढा न कर दे वो सिन्दूर क्या है ?

जो न करा दे जग हसाई ,हाथ पैर में हथकड़ी बेडी न लगवाई 

जिससे न  बिलखें बहनें  और सब लुगाइ,वो फितूर क्या है?

जो न चुनाव जीतवा दे,ललाट के लाल टीके को हरा न  करवा दे 

जो नया भारत ,हिंदुस्तान  न बनवा दे  

वो  ननबायोलॉजिकल डंकापति हुजूर क्या है ?

जहाँ सत्ता के सामने संविधान ,समाज ,सिपाही सभी हों समर्पित 

वहां ओक्टोपसीय नंगे राजा का कसूर क्या है?

27 मई  2025 वसुंधरा 






I RAN

"I ran, because I can"

You can't ,because you aren't

Those who ran, should understand

Run is not only physical

It's also logical,mental,and spiritual

Run,run,run not only physically 

Daily,weekly,monthly and yearly

but logically,mentally,spiritualy,

And also instantly .

25 May 2025 Vasundhara Indirapuram canal



Friday, May 23, 2025

गरीबों का कौर ( MORSHEL OF POOR)

               गरीबों  का कौर 

देखते हैं कुछ और सुनते हैं कुछ और ,हकीकत कुछ और होती है 

मंजिल कही और चलते कहीं और ,ठौर कहीं और होती है। 

        बिस्तर कहीं और ,शरीर कहीं और,मन कहीं और होता है 

        कल जो था जेल,सेल,बेल के पीछे,आज वो निगम का महापौर होता है ,. 

        देखो जिसे होना चाहिए पैरो तले वो हमारा सिरमौर होता है. . 

चाहते हैं कुछ और मिलता है कुछ और अरे,प्रीतिकर तो कुछ और होता है 

भाता है कुछ और साथ रहता है कुछ और  मिलकर तो कुछ और होता है.

 सफलता कहीं और आनंद कहीं और जीतकर तो कुछ और होता है 

स्वास्थ्य कहीं और ,स्वाद कहीं और ,रुचिकर तो कुछ और होता है. 

         दांतो में गड़ी हो जब गुठली तो रस पे कहाँ गौर होता है 

         बदचलन हो जब मौसम तो बृक्छ  में कहाँ बौर होता है। 

देह में कोई और नेह में कोई और अब कहाँ असली सात भौंर होता है 

अरे! मिलता घर में सुकून कहाँ जब देखो तब सरकारी दौर होता है। 

         जलाता है कोई ,फलता है कोई शशी का सौंदर्य सूरज के बतौर होता है 

         जिस दौड़ में पागल है आज की युवा पीढ़ी वो पैकेज गरीबों का कौर होता है। 












पेड़ का प्रश्न ( QUESTION OF TREE)

             पेड़ का प्रश्न 

मैंने पेड़ से पूछा 

तुम क्यों मेरे जन्म के पूर्व से ही खड़े हो ?

क्यों नहीं टूटते ,गिरते ,सड़ते 

दूसरे पेड़ो से लड़ते ?

कितनी ही प्रचंड आंधियां ,भयंकर तूफ़ान एवं बाढ़ आये 

वह रहा चुपचाप खड़ा 

मेरे सवाल का जवाब दिया 

और मुझसे ही प्रश्न जड़ा 

बसंत में हम सभी हंसते हैं  ,पतझड़ में झड़ते हैं 

एकसाथ सभी खिलते हैं ,फूलते हैं ,फलते हैं 

आंधी में साथ ही हिलते हैं 

इसलिए कि 

पतझड़ में हंसाने ,बसंत में रुलाने 

आंधी में झूठे धीरज बंधाने 

और विकाश की सही दिशा दिखाने 

हमारा कोई नेता नहीं होता 

तुम सदियों से अपना नेता क्यों चुनते हो ?




मुखौटा (MASK)

                 मुखौटा 

जो खाने में मजेदार पचाने में बड़ा कठिन होता है ,

ऊपर से उबड़ खाबड़ वो अंदर से महीन होता है 

अधर पर मधुर मुस्कान,ह्रदय में हलाहल 

बताये कोई,क्यों उसी पर यकीन  होता है ?

पुराने पेड़ को क्यों छोड़ दिए बूढा समझकर 

मौसम आने पर फिर से वही तो नवीन होता है 

जो दूर से लगता था खुला खुला ,फैला फैला 

पास आओ तो देखो वो कितना गझीन होता है ?

लापरवाही से दबा देते हैं जिसे हल्काऔर छोटा समझकर 

वक्त आने पर वह मुद्दा बड़ा संगीन होता है 

माघ की रात में  जिन मासूम हड्डियों ने सहा है सर्द हिलोरें 

वही जानती  है फागुन  का नरम  धूप  कितना रंगीन होता है.. 















श्रमिक (LABOUR)

                                               श्रमिक 

विश्व सभ्यता के वास्तविक निर्माता ,मानवता के भाग्य विधाता 

श्रमिक, तुम्हे नमस्कार ,सत बार , सहश्र बार, बार- बार ,

हर बार तुम्हारी चरण बन्दना करता मै हे ! कामगार !1 

जो ईमानदार है, श्रम करता है , जो झूठा ,फरेबी वो भ्रम रचता है 

श्रमिक हवश से दूर रहता है ,संतोष धन से भरपूर रहता है। 

करुणा से प्रेरित हो,  करता है कारबार 

तुम्हारी चरण  . . . . 2 

श्रम से ही कुदाल ,फावड़े ,हल,मज़दूर बनाते 

किसानो के संग मिल होली, बिरहा ,कजरी गाते 

पसीने बहाते दिन में ,रात में  गहरी नींद पाते 

न छल,छद्म,न झूठ ,फरेब ,न करते वे घाते 

कुदरत से सिख अपने विवेक विश्वास को करते वे धारदार 

तुम्हारी चरण वंदना ,,,,,,,,,,,,3 

श्रम स्वधर्म है ,श्रम स्वाभाव है ,तन, मन ,जीवन में यही भाव है 

सेवा के सिवा कोई नहीं चाव है 

पाने को सर्वस्व ,खोने को कुछ नहीं दाव है,

श्रमिक, तुम स्वस्थ,सुन्दर,सुडौल,और शानदार 

जीवित और जानदार 

तुम्हारी चरण वन्दना करता मै हे ! कामगार 

/सात बार शहस्र बार ,बार, बार ,हर बार 

श्रमिक तुम्हे नमस्कार।  4 


रामेश्वर दुबे ,
25  मई 2016 ,( आकाशवाणी ,लखनऊ के श्रमिक जगत कार्यक्रम में प्रसारित) 











 

मौत (DEATH)

                मौत     

साँस का बंद होना ही मौत नहीं है ,

ज़बान का बंद होना भी मौत है। 

अपनी आँखो से न दिखना भी और 

अपनी कानो  से न सुनाई पड़ना भी मौत है। 

मायावी द्वारा दिखाए गए करतब 

को ही सिर्फ देखना मौत है 

और उसकी अपनी ही मन 

की बात सिर्फ  सुनना भी मौत है। ,

साँस बंद होना शरीर की  मौत है 

ज़बान बंद होना आत्मा की मौत है 

आत्मा पहले मरती है , शरीर बाद में। 

22 मई 2025 ,वसुंधरा 



मेरे साथी -मेरा बचपन (MY FRIENDS-MY CHILDHOOD)

                                          मेरे साथी -मेरा बचपन  

मेरे साथी ,मेरे साथी 

हम वैसे ही रहते जैसे 

झुण्ड में रहते हाथी। 

संकट में हम हाथ बटाते 

नाचते गाते शोर मचाते 

बस में सब साथ ही जाते 

अंधों  को रोड पार कराते 

जहाँ दीखता प्लास्टिक कूड़ा 

हम मिल सब उसे हटाते।

धरती माँ को रोज सजाते

पौधों को पानी से  रोज पटाते।

नहीं तोड़ते फूल ,पत्ते, टहनी और डाली 

मदद करते जिसकी अच्छी नहीं मालत हाली 

बिल्लू ,पिल्लू को घर में हमने पाली। 

उनके संग खेलते,कूदते,,हसते ,गाते,

वाह!बचपन में क्या आनंद है पाते।

पुष्प,पशु,पक्षी पादप,तितली,दोस्त  के साथ। 

अहा! क्या भोला बालपन व् अद्भुत विश्वास। 


20 अप्रैल 2025 ,वसुंधरा,गाज़ियाबाद 















Saturday, May 17, 2025

होली रे

 होली रे 

पूरे बरस मै  परस को तरसा ,तू ना कुछ बोली बोली रे 

मधु मौसम मन हरसा हरसा ,बिन बोले मेरी हो ली रे, हो ली रे। 1 

चाहे बम मारो या भाला बरछा ,या बन्दूक से गोली रे 

फागुन की बलिहारी जाऊँ ,बिन पूछे तेरी हो ली रे ,हो ली रे।2 

गली गावं में चर्चा ,चर्चा आज ही भीगी अंगिया चोली रे 

मौन मौन ही रटत ये रसना ,आज साजन की हो ली रे ,हो ली रे। 3 

बिरह में तड़पत उमर  सब बिता ,अब उठी फागुन में डोली रे 

पीया घर हंसी, पीहर सब रोअत ,किसकी थी किसकी हो ली रे हो ली रे।4 

मोर,काग,पीक कुहुकत, कुहुकत,रखो न मेरी खाली खोली रे 

मधुमास मन तड़पत तड़पत ,भर दो भर दो ,आज तेरी हो ली रे हो ली रे। 5 

नाला, नदिया,गोरिया ,संवरिया,पेड़ पत्ता सब डोली रे 

भंवरा फूल डोलत बगिया,बगिया  

आज प्रेम बीज बो ली रे ,बो ली रे

आज बस तेरी हो ली रे ,हो ली रे। 6 

कैसे गाऊं बिरह का गाना ,बिन मिले साजन आज मत जाना 

भर दे, भर दे खाली झोली रे,

आज तो तेरी हो ली रे हो ली रे।7 

मैं तो रूठी घर से निकली ,सब कहें बौरी पगली, पगली

भई बिबस जब झांझ मजीरा लिए आई सखियन की टोली रे 

ये बौरी अब तेरी हो ली रे हो ली रे।8 

सिर्फ दोष नहीं मेरा अपना ,तुमने ही मुझे छेड़ा सजना

कि  बिरही बन फागुन में रहना  

पर अब तक तेरी पोल न खोली रे 

आज तो तेरी हो ली रे ,हो ली रे। 9 

जनम जनम की लगी जो करिखा ,रगड़ रगड़ तूने तत मेरा परिखा ,

लागि जो दगिया कटु तेरी बतिया रतिया धो ली रे ,धो ली रे 

आज साजन तेरी हो ली रे हो ली रे। 10 

मार्च 2006 झाँसी   

  

   

  

 











 




प्रेम गीत

 प्रेम गीत 

जब से आपका नेह मिला ,मौसम भी अमृत बरसाने लगा है 

उपाधि की आश गयी क्या ? और भी आनंद आने लगा है 

चमन को कैसे बचाएं उल्लुओं ,गिद्धों के राज में 

यही एक चिंता तोता,मैना,कोयलों ,भौंरो को सताने लगा है। 

डाल, पत्ती की  बात क्या , आकाश में भी है इनकी पहुँच 

हर परिंदा डर-डर कर अपना पंख फड़फड़ाने लगा है। 

जबसे आपके दर्शन हुए दुर्लभ ,ह्रदय और भी प्रेमगीत गाने लगा है। 

सब जगह बस आप ही आप,अब तो पतझड़ में भी बसंत आने लगा है। 

जब से नियति के नियम होने लगे भंग ,सेर को गीदड़ भी डराने लगा है। 

शहर में सहर होती ही कब ,जबसे बिजली जगमगाने लगा है ?

जब से आपके नयन के नीर ने छुए हमारे बदन ,

चाँद का ठंढापन भी हमारे हृदय को गरमाने लगा है। ,

पांव भी थिरकने को बेताब ,जब से आपका गांव करीब नजर आने लगा है। 

मार्च 2006 









 



उनके गुमान

 उनके गुमान 

हुजूर हमारी गली से बिन बताये 

खामोश गुजर जाते हैं 

कमाल है,पता नहीं 

कैसे हम जान जाते हैं? 1 

दरिया की गहराई में एकांत 

 वे  मधुर तान भरते हैं 

सतह पर स्वर भला 

कैसे हम पहचान जाते हैं ?  2 

जिनके आने की आहट से 

दिल में उठती थी मोहक हिलोरें 

उनके अहसास अब 

क्यों मन में तूफान लाते हैं ? 3 

जब हम थे अजनवी 

रोज लाते थे वे प्यार के सन्देश 

अब उनकी याद, क्यों 

मौत का फरमान लाते हैं? 4 

जिनकी धड़कनो से चलती थी 

कभी अपनी एक एक सांसे 

पता नहीं क्यों अब वे नहीं 

उनके अरमान आते हैं ? 5 

किसे कहते हैं प्यार,जज्बात,मुहब्बत 

अभी देखना है बाकी 

कि वे खुद आते हैं 

या उनके अरमान आते हैं?  6

दिसंबर 2005 


















विधान

 विधान 

देश,राष्ट्र ,अनुशासन एवं संविधान के नाम पर 

धर्म,जाति ,मजहब,रंग,नस्ल,भगवान् के नाम पर 

बनाते है मनुष्य को बहरा और गूंगा 

अपाहिज,अंधा,लंगड़ा,और लूला 

और फिर देते हैं दया बस टुकड़ो में  दान 

या भीख में पद,पैसा,प्रभुत्व,ईनाम और सम्मान 

चाहते हैं सभी करें इस परम्परा का पालन 

जो करते मानने से इन्कार 

कर दिया जाता उन्हें जाति धर्म से  वहिष्कार 

दिया जाता यातना, जेल,पुलिस,लाठी ,गोली,मुठभेड़ 

ओह रे!चौपट राजा ,और नगरी  अंधेर।

जून 2015 

फर्क पड़ता है

 क्या फर्क पड़ता है 

कहाँ पहुंचे  ,कितना चले ?

फर्क पड़ता है 

कैसे चले, किस पथ पे चले ?

क्या फर्क पड़ता है 

कितना पढ़े,और कितना गढे ?

कितना बढ़े और कितना चढ़े ?

फर्क पड़ता है 

क्या पढ़े और क्या गढ़े ?

कैसे बढ़े और   कैसे चढ़े ?

क्या क्या खाये और कितना खाये 

से क्या फर्क  पड़ता है ?

फर्क पड़ता है कि 

किसका खाये और कैसे खाये ?

क्या फर्क पड़ता है 

कहाँ सोये, कितना सोये ?

कहाँ रोये, कितना रोये ?

फर्क पड़ता है कि 

जहाँ भी सोये कैसे सोये ?

जहाँ भी रोये कैसे रोये?

कब रोये और कब सोये?

सोचिये अभी तक 

क्या पाए और क्या खोए ?

क्या काटे और क्या बोये?

मई 20015 
























Friday, May 9, 2025

पत्थरऔर देव

पत्थर  को भी जब पहनाते   ताज 

होते वे पूज्य ,सिंहासन पर विराजमान 

पण्डे,पुरोहित ,नगाड़े ,ढोल,झाल 

पैसो की बरसात, भक्तो का धमाल 

मिलाने का समय तय 

शांति की जगह हिंसा और भय ही भय 

सोने चांदी के चौखट किवाड़ 

जो पहनाया ताज 

वह देख रहा 

आस्था श्रद्धा  भक्ति प्रेम विश्वास 

का मायावी खिलवाड़ 

घर और बाजार

 पहले घर था मकान नहीं इसलिए उसकी कोई कीमत नहीं

पहले था हमारा  घर सड़क से  दूर 

शांत , शुद्ध खुशहाली से भरपूर

आज मेरे मकान  का लौह दरवाजा सीधे सड़क पर खुलता है

शोरगुल के बिच हर  कोईआने वाला कुत्तेऔर दरवान  से जुझता है 

कीमतआसमान छू रहा 

मुंह मांगा दम मिल रहा

 कोई दिक्कत नहीं 

कोई दिक्कत नहीं 

पहले हम घर से निकल बाहर बाजार जाते थे 

दो पैसे में दादी का चिमटा और गुड़ की मिठाई लाते थे 

आज पहुंच गया है बाजार हमारे घर में 

छाती पर चढ़ छीन रहा जो भी है कर में 

बाजार में घर ,घर में बाजार 

बिन घर जारे स्वर्ग मिले कबीरा भया लाचार 

किसी की हिम्मत नहीं 

जो पहले  बाजार के समय और स्थान को बदल सकता था 

बाजार रामघाट पर हप्ते में शाम को एक दिन लगता था 

आज घर में ही चौबीसो घंटे बाजार लगता है 

जहाँ प्लास्टिक का सदाबहार फूल खूब फबता है 

बाजार का कमाल कि 

बरसात में बसंत और ग्रीष्म में हेमंत 

कोयल की टीबियाई  कूक और पसीने का अंत 

कोई इज्जत नहीं 

पहले पानी हवा भोजन अतिथि को नहीं थे बिकाऊ 

शरीर क्या आज आत्मा ,चरित्र,आस्था,धर्म,ईश्वर 

रिश्ते नाते कुछ भी नहीं टिकाऊ 

सब बाजार में कार की मॉडल की तरह बदल रहे  

फिर भी लैला मजनू रोमिओ जूलियट सावित्री सत्यवान 

की सीरियल कहानी में मगन रहे 

जीवन से जो जितना दूर 

लगता उतना परिपूर्ण 

क्या पहले भी था 

या सिर्फ आज ही ?












आज का बाजार

 वसुधेव कुटुम्बकम मत कहो,कहो विश्व व्यापार

यू एनओ को मारो लात करो वियतनाम,अफगान,इराक पर वार

  श्वास लो  धुआ पियो कोक ,पेप्सी बीयर बार

करो विचारों इतिहासों का अंत 

सभ्यताओं पर निरंतर वार

पढ़ो बाजार, पढ़ाओ बाजार, बढ़ो  बाजार, बढ़ाओ  बाजार

जय   हो, जय हो, जय हो,बाजार ,जय हो बाजार 

प्रजातंत्र मानवता को बचातेअणुबम,नारे,तलवार

झूठ,फरेब,लोभ ,भय ,सेक्स विज्ञापनों  की भरमार

अपराधी ,हत्यारे खुलेआम घूमे संत सभी बंद कारागार

हाथ में लैपटॉप कान में सेल फोन चमचमाती मोटर कार

चमड़ा मोटा दिमाग छोटा हृदयहुआ  छलनीऔर तारतार 

धन्य हो बाजार,धन्य हो बाजार,धन्य हो बाजार

अब मंदिर, न मस्जिद न गिरिजा, न गुरुद्वार 

न जैन, न पारसी ,न यहूदी, न बौद्ध बिहार 

न पंडित, न मुल्ला, न पादरी, न जत्थेदार 

न भाई बहन, न माई बाप ,न दोस्त यार 

सारे रिश्ते नातो  में पसर गया बाजार 

भाड़े के पति पत्नी ही भरा पूरा परिवार 

अब रहा गाँव न पड़ोस न घर न द्वार 

उदय हो बाजार,सुहृदय हो बाजार,अभ्युदय हो बाजार 

सड़क बनाते सतनु मर गए घड़ा बनाते घुरा कुम्हार

मॉल में दब गए दुधन  ददू , जूता बनाते चतुरी चमार 

मुसहर टोली, मनाई होली पकड़े जब आतंकी चूहे चार 

प्लास्टिक खा के गाय मर गयी, कूड़ा बीनते कनुआ कहार 

पेस्टिसाइड पीके रेड्डी राणा मर गए ,मछली पकड़ते पुथ्रन  पेरियार 

भारत भवानी की भ्रूण में हत्या ,पार्लियामेंट में जुत्तम पैजार 

पस्त हो बाजार, त्रस्त हो बाजार, ग्रस्त हो बाजार

पापा को मिला जबरन वीआरएस 

चाचा  की फैक्ट्री बंद आज का समाचार

दादी मेरी खाट पड़ी बाबा बूढ़े बेहद बीमार 

बहन बिकी बाज़ार में जवान बेटा बेरोजगार 

मनुआ मरा दवा बिना मुनिया मरी बिन आहार

हय  हो बाजार ,छय  हो बाजार,लय  हो बाजार

जंगल की आग  की तरह पछेया हवा में बढ़ रहा बाज़ार 

गाय, भेड़, बकरी, खरगोश 

तीसरी दुनिया के सब जानवर लाचार 

पुरे जंगल में बचा एक सेर रहा दहाड़ 

पुरवइया बयार की है सबको इन्तजार 

ध्वस्त हो बाजार , नष्ट हो बाजार , विनष्ट हो बाजार 















 












पानी

 पढ़ा है विज्ञान में

पानी का घनत्व तेल से ज्यादा होता है

लगता कुछ और पर कुछ और होता है 

इसीलिए तेल पानी पर छा जाता है 

पानी के ऊपर ऊपर  ही बहता है 

तो क्या विज्ञान के इसी नियम के तहत 

पुरानी-पानीदार सभ्यता पर छा गया  तत्काली तेली सभ्यता

विज्ञान का अटल नियम है 

तेल पानी मिलेगा 

तो पानी पर तेल बहेगा 

वर्षों से मैं चिल्लाता रहा 

जोर  शोर से बड़बड़ाता रहा

पानी तेल मत मिलाओ 

न पूरब पश्चिम एक कराओ

पूरब अपना पानी  राखो

पश्चिम में व्यर्थ मत बहाओ







चुल्लू भर पानी

हमारे पास नहीं है ,चुल्लू भर भी पानी

आज ही नहीं सदियों से

हम सिर्फ कोक, पेप्सी, बियर, बोतल पीते हैं

मैकडॉनल्ड, बर्गर,पिज़्ज़ा,चॉकलेटसे ही जीते हैं

इसीलिए हमारी चमड़ी सफेद, दिल काले और खून ठंडे  हो गए हैं

हम में नहीं बची करुणा, शर्म, हया, लाज ,सम्मान (एक भी मानवीय गुण)

नहीं तो मर नहीं जाते चुल्लू भर पानी में!

मासूम बच्चों पर बम गिराने से पहले

गर्भवती माओ पर मशीन गन चलाने के पहले

निहथ्था  कर फिर मिसाइल चलाने से पहले

लाश  पर महाशक्ति विश्व विजेता के बूट बढ़ाने से पहले

लेकिन मरे कहां ?पानी चुल्लू भर भी नहीं

सिर्फ कोक,पेप्सी,बियर- तंत्र

वह भी बोतल बंद

लेकिन शेष दुनिया वालों

तुम्हारे त्वचा तो काले, पीले, श्याम, हृदय लाल एवं खून गर्म थे

तुम तो करुणा, सत्य, समता, शांति के पुजारी

मेसोपोटामिया,बेबीलोन, हड़प्पा,मोहनजोदड़ो,

बौद्ध, तिब्बती,पूर्वी सभ्यता के स्वाभिमानी

अहिंसा, सत्य ही तुम्हारे धर्म थे

तुम्हारे यहाँ तो पानी के जलाशय  ही जलाशय हैं

गंगा, कावेरी,नर्मदा ,सिंधु, दजला, फरात, ह्वांग हो नील 

नदियां, तालाब, पोखर, झरने और झील

तुम सब ये देखने से पहले क्यों नहीं मर गए

ये दिन भी देखने के लिए क्यों रह गए

या देखने के बादआघात से या डर सेअब क्यों नहीं मर जाते

नहीं, नहीं  मर सकते 

क्योंकि तुम्हें भी लग गई है लत 

और शुरू कर दिया है अरसों से  पीना,पेप्सी कोक और बियर

तभी तो मेरे साथ रहे रत 

उसे नंगा, निहत्था करने कराने में माय डियर

और जब वह निहत्था ही नहीं कंगाल हो गया

कुछ भी न बचा नर कंकाल हो गया

चुल्लू भर पानी को तरसने लगा तो हमने भी  दिखा दी अपनी बहादुरी

और उसे कर दिया धराशाई

अब हमें तुम बर्बर,आतताई , गुंडा या शैतान कुछ भी कह लो

अब इन्हें ही शर्म आएंगी 

यह संज्ञाएँ ही  लजायेंगी 

चुनौती है विश्व के सभी साहित्यकारों, कवियों, लेखको ,समाज एवं मनोवैज्ञानिकों को

खोजें, नोबेल पाएंऔर करें मेरा नया नामकरण 

तब तक लिपटे रहने दो मेरे ऊपर प्रजातंत्र मानवता का आवरण

अगर खुरचोगे तो मानवता ,प्रजातंत्र के हत्यारों 

फिर दूसरी गलती के अपराध में तुम्हारा भी वही हश्र होगा

निहत्थे नंगे करने के पहले हीअब तो पतलशायी  कर दिए जाओगे

क्योंकि पहली गलती तुमने पहले ही कर दिया

मेरे दुश्मन बन गए जो खुल के मेरा साथ नहीं दिया

इसलिए दुनिया वालों सावधान,अभी भी बहुत पानी है

चुल्लू भर पानी न मांगना पड़े उधार  या कर्ज 

 मरने के लिए

अतः खुद मर जाओ

या कोक, पेप्सी ,बियर ही पीयेंगे का नारा लगाओ 

आया तुम्हारी समझ में नेताओं, दुनिया के रहनुमाओं

क्यों नहीं है हमारे पास यह मुहावरा कि 

चुल्लू भर पानी में मर जाओ


20 अप्रैल 2003,लोधी गार्डन ,नयी दिल्ली