उत्पादकता बढ़ती जोर-शोर से फिर क्यों गरीब लाचार
सेवा के नाम पर होती जो जग में दीन पर अत्याचार
गुणवत्ता का शोर मचा है ,सारे जग में भाई
पर देखो शान्ति जग में कहीं नहीं है छाई १
उत्पादकता के लाभ गटकते ऊँचे थोड़े लोग
मानवता के नाम पे करते प्रकृति का भोग
गरीब जनता ,मज़दूर किसान मुँह बाए ऊपर ही देखे
शायद थोड़ा लाभ हमें भी मिले तो हम भी चखें २
पैर के नीचे की धरती ,जल जंगल सब छीन लिया
हथियार,नशा,सौंदर्य प्रसाधन पूरी मानवता को लील लिया
विकास की क्रूरतम दशा और दिशा है उल्टी भाई
मानवता को रौंदते कुचलते आज जग के रहनुमाई ३
भूख, रोग ,कुपोषण ,शोषण ,हिंसा से जनता बिलबिलाती आई
जड़,भ्रस्ट,निर्मम ,प्रतिद्वंदी दुनिया यह बात किससे कही जाई
खेल-तमाशे ,नाच -गान भूखे पेट कभी नही सुहाते
नस्ल ,रंग,धर्म,जाति के भेद उसे कभी नहीं सुहाते 4
मानवता के मारक ये सब छीनते जनता के चैन अमन
तितली ,पक्षी, पशु ,पादप, पुष्प-पत्तियां नही बचे चमन
देखें,कैसे उत्पादकता ,मानवता पर हो गयी है हावी
नदियां सुखी ,पर्वत पिघलें, गुणवत्ता की खो गयी चाभी 5
उत्पादकता रोज बढे ,बढ़ती भूखे ,नंगो की आबादी
नित नव दवा तकनिकी विकशे कुछ चाँद पर काटे चांदी
मान ले अगर पुरे आर्थिक जग को एक कटोरा
बिन पेंदे का लोटा ,भ्रस्ट उच्च वर्ग ने सब बटोरा 6
मज़दूर किसान तन मन से डाले उसमे उत्पादकता पानी
तरसे एक बून्द को प्यासे ,फिर भी न करता कोई नादानी
रोज नई तकनिकी वादा करती कल करेगी सबकी इच्छा पूरी
हबस करती दूनी ,रोग चौगुनी आवश्यकता रहती अधूरी , 7
सम्बन्ध सब छलनी हो गए,हृदय हो गए तार- तार
बेटा प्रवाश में जी तोड़ कमाए ,घर में माँ रोये जार जार
लक्ष्य एक है -अंदर खाली ,बाहर दुसरो को झूठ दिखाते
संतोष परम निकृश्ट धर्म है, बढ़ाओ हवश यही सिखाते8
मानव की हालतदेखो ,अंदर खाली बाहर भरा पड़ा है
बिना नीव के सतह पर जैसे ऊँचा भवन खड़ा है
हवा की हल्की झोको से वह हिलने गिरने लगता है
इसीलिए आज का मानव सुरक्षा में रत रहता है 9
बाहर बोझ से दबा है मानव ,अंदर खाली-खाली है
माथे पर विज्ञापन की आभा आधर पर क़ृत्रिम लाली है
मानवता की सुधारो दशा ,उगमा बिना नही कोई चारा
गुणवत्ता जन गण मन में हो ,बदलो उत्पादकता की धारा 10
[मानवता है अनंत प्रेम रस ,बिन अगाध आत्मियता सम्बन्ध न कोई
केयरिंग और शेयरिंग से ओत -प्रोत सब अखंड- जीवन-रस सोई ]