Saturday, December 28, 2024

DHOKHA

 झेल गया दर्द का झोका,होकर शोशित खाकर धोखा

गहराई से सोचा , मै भी दुङ्गा धोखा

दिया धोखा, अन्तर्मन कांपा

आकाश पाताल सब नापा

जिन्हे थग पाया

जिनका शोशन कर पाया

वे निकले 

हमसे भी ज्यादा ईमानदार

सहज, सीधे सादे बेगार

क्रिश शरीर

थे हमारे एक्दम करीब

यह देख, दर्द से दिल दुखने लगा

कन्ट शब्दहीन हो सुखने लगा

मन से बार बार पूछने लगा

तेरा अभिसट क्या है?

धोखा देना या धोखा खाना?

थगना या थगा जाना?

आदर्श तो है न थगना न थगाना

थगे जाने से सिर्फ़ मन ही मोट

थगने से चित्त पर चोट

जब हो जन,धन,शक्ति,शरीर मे सुख

अन्ह मे लिप्त,थगने से नही कोई दुख

पर जब होते असहाय,लाचार, वीमार

रुबरु होते थगने की चाल से

जिसे थगा होता उसका भी दीदार

पीडा जब अत्यन्त असह्य होती

ईश्वर,पराशक्ति की पूजा तब सह्य होती

धोखा खाने का दर्द सिर्फ़ एकबार

धोखा देने का दर्द बार - बार

धोखा खाकर मिलति है भयङ्कर शक्ति लडने की

जिजिविशा,उर्जा,शक्ति कुछ कर गुजरने की

धोखा देकर मिलता है उपहार डरने का

आत्मा के मरने का

अगर मुझे हो चुनना सिर्फ़ दो मे से एक

तो खाउङ्गा धोखा, यही कहता विवेक



































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