एक नही अनेक बार किया पाषाणी प्रहार
कि मान ले तू हार
कि असत्य के आगे सत्य कभी न पाए पार
पर सत्य सास्वत ,सृजनहार
के आगे कुंठित सब हथियार
तो मेरे फौलादी इस्पाती घर पर
किया वज्र से मार
एक नहीं अनेक बार
खोजते रहे कमजोरी का कोई न कोई जरिया
फिर भी न टेढ़ा कर पाए एक भी सरिया
और न एक भी नट -बोल्ट ढीला कर पाए ,
हाँ चमकती सफ़ेद दीवार पर एक दाग जरूर लगाए
जिसे बरसात की पहली फुहार ने ही मिटाये।
मैंने सिर्फ उंगली उठायी उनके मकान की तरफ
दरक गए शीशे, भय से भागे ,आंखे मीचे
गली में करने लगे गाली गलौज ,चोरी चकारी ही नहीं
बल्कि बेहयाई पर उतर आए
तब जाकर हम समझ पाए -
कबतक पम्प से जल को रखेंगे उंचाई पर ?
कबतक दाब से भाप को रखेंगे निचाई पर ?
चेतना भी जल की तरह ढूंढ लेता है अपना तल
या कहें हर जीव सदृश जल
ढूंढ लेता है अपना तल।
10 मई 2005 दिल्ली ON THE WAY TO NSC
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