Saturday, May 23, 2020

kahani me kavita

                                             कहानी  में कविता                रामेश्वर दुबे
                                                                                          8  दिसम्बर ,2016
                                                                             नोट बंदी के ठीक 3हपते बाद
बचपन से ही सुनते आए हैं एक कहानी
परदादा से दादा ,दादा से पिता (नहीं अब तो पापा )
अब मैं सुनाता आपको वही जबानी।
           एक था राजा बिलकुल ही नंगा
           अंग, प्रत्यंग  एकदम बिद्रूप
          कसाई, क्रूर ,काला,कपटी,कोरा- कुरुप
          देखकर सारे "सयाने विद्वान "  हुए मुग्ध
         देख राजा का अद्भुत रूप
         भूल गए सुध और बुध।
वाह!क्या वस्त्र है ,सौंदर्य है,साज है ,
ना देखा ऐसा राजा न देखा ऐसा राज है.
राजा आज तो खूब सजा है ,
वस्त्र उसपर खूब फबा है ,
इसीलिए तो देश अब पुनः विश्व गुरु बन रहा
और विदेश में नाम बहुत ऊपर चढ़ रहा।
         एक निर्दोष बालक राजा को देखा
        और गैलेलिओ की तरह बुदबुदाया-
        अरे!राजा तो वस्त्रहीन,निर्मम नंगा है.
        राष्ट्र भक्त,धर्म भक्त ,अंध भक्त उसे हड़काये
        तू तो बालक है,क्यों नाहक लेता पंगा है.
पोस्टर पढ़,धार्मिक विद्वानों और राजा की बात सुन ,
आँखिन देखि दूर कर,नाक तो कटेगी ही,साँस भी बंद हो जायेगी
अन्यथा आँख अपनी बंद कर।
क्या हुआ बालक का किसी ने नहीं बताया -
न परदादा ने ,न दादा  ने,न पापा ने
और मुझे भी नहीं मालूम ,आपको मालूम है क्या?
                पर एक बात मालूम है ,
            आज इस देश में एक भी बच्चा नहीं बचा है ,
            हाँ सच है ,एक भी निर्दोष बच्चा नहीं बचा है ,
            सिर्फ राजा सजा है ,सिर्फ राजा सजा है ,
            न कविता बची है न कबीर बचा है ,
            न विज्ञान बचा है न ईमान बचा है ,
             सिर्फ भक्त बचे हैं और राजा सजा है ,
             प्रजा में गर्म खून न रईसों में पानी बचा है
              सिर्फ  सजा है ,सिर्फ राजा सजा है।  

         
                    

No comments: